गुरू शव्द की ही बहुत कींमत हुआ करती है – मुनि श्री विनम्र सागर जी महाराज

0

अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन


विदिशा(भद्दलपुर) – गुरु के बारे में मात्र सुनना ही पर्याप्त नहीं होता है वल्कि जो सुना है उसको चुनकर अपने जीवन में उतारना ही गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा और भक्ती है। उपरोक्त उदगार मुनि श्री सौम्यसागर जी महाराज ने शीतलधाम विदिशा में दीक्षा दिवस के अवसर पर प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि आप सभी को लगातार तीन दिन तक गुरूदेव के विषय में संस्मरण सुनने का मौका मिलेगा आप सभी लोग उन पलों का पूरा लाभ उठायें। इस अवसर पर मुनि श्री विनम्र सागर जी महाराज ने कहा कि “आचार्य श्री के चरणों में श्रीफल चड़ाने से कभी दीक्षा नहीं मिलती, उनको अपना दिल चड़ाना पड़ता है”तब कंही जाकर दीक्षा मिलती है। उन्होंने कहा कि संघ में जितने भी साधु है, वह सभी जानते है कि गुरूदेव कभी भी दिखावे के लिये, या किसी के सपोर्ट करने से दीक्षा नहीं देते, कोई सुंदर हो या अच्छा लिखता हो या किसी की अनुमोदना से भी वह दीक्षा नहीं देते, गुरूदेव से दीक्षा उन्ही को मिलती है, जो पूर्णतया समर्पित और अनुशासन में रहता हो, वह “शिष्य को अपना रुप ही नहीं देते वल्कि अपना स्वरुप ही प्रदान कर देते हैं

उन्होंने 2013 रामटेक का स्मरण करते हुये कहा कि जंहा पर कुल भूषण और देशभूषण की दीक्षा संपन्न हुई उस स्थान पर उस दिन 24 मुनिराजों की दीक्षा संपन्न हुई थी, वह दिन मुझे आज भी याद है, उन्होने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज जैसा गुरु इस धरती पर अब दोवारा जन्म नहीं लेगा यह पक्की बात है, उनको तो अगली पर्याय में सीधे साक्षात अरिहंत परमेष्टी वनना है, ऐसा हम सभी को विश्वास है। उन्होंने कहा कि गुरू शव्द की ही बहुत कींमत हुआ करती है, मात्र गुरु का नाम सुनने से ही त्रियंचों की पर्याय वदल जाती है, तो जिनके जीवन में साक्षात गुरूदेव हों उनका जीवन कैसा होता है, यह आप सभी हम लोगों को देखकर ही महसूस कर सकते है। उन्होंने कहा कि जैसे लोटे को जितनी बार भी मांजा जाता है, वह लौटा उतना ही और चमचमाता है, उसी प्रकार पूज्य गुरूदेव है जो कि अपने शिष्य की एक बार नहीं वल्कि अनेकों बार परिक्षा कर मांजते रहते है, जिससे उसकी चमक में कोई कमी न आ जाऐ, क्यों कि उनको आचरण में शिथिलता कभी भी बरदाश्त नहीं होती वह स्वं भी अनुशासन में रहते है,और अपने सभी शिष्यों को अनुशासन में ही रखते है,

उन्होंने एक उदाहरण दिया कि आपने समुद्र में देखा होगा कि बड़ी बड़ी वजनदार लकड़ीयां होती है जो कि कभी समुद्र में डूवती नहीं है, तो लकडी़ कहती है कि जंहा पर एक सुई भी डालो तो वह डूव कर नीचे पहुंच जाती है,बंही इतनी भारी भारी लकड़ीयां समुद्र की सतह पर तैरती रहती है, तब जल कहता है कि सुनो लकड़ियों तुम्हारे अंदर हमारा अंश विद्यमान है, जो कि तुमको डूवने नहीं देता उसी प्रकार पूज्य गुरूदेव है जो कि अपने शिष्य को इतना अधिक पक्का कर देते है, कि फिर वह कंही भी चला जाऐ अलग ही नजर आ जाते है। इस अवसर पर निश्वार्थ सागर जी महाराज ने भी सम्वोधित किया। मंच पर संघस्थ सभी दस मुनिराज विराजमान थे। श्री सकल दि. जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ने वताया दौपहर में भी मुनिसंघ ने अपने प्रवचनों में वैराग्य के क्षण और दीक्षा के प्रसंग तथा गुरू के प्रति समर्पण व्यक्त करते हुये कई कथानक सुनाऐ। यह क्रम लगातार 14 अगस्त तक जारी रहेगा। चातुर्मास कमेटी के अध्यक्ष अभय वैद्य सी.ऐ सहित सभी पदाधिकारिओं ने कार्यक्रम में पधारने का अनुरोध किया है।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन विदिशा,मध्यप्रदेश
संपर्क – 7828782835/8989696947

Leave A Reply

Your email address will not be published.