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हथौड़ा से ताड़ित किया सोना ही अलंकार बनता हैं : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर। श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर तथा साध्वी भद्रिकाश्रीजी म. ने धर्म संदेश मे बताया कि – प्रभु महावीरदेव का जीवन भी एक ज्ञानशाला है । उनका बचपन, उनकी किशोरावस्था, यौवनावस्था, उनका श्रमण जीवन, उनकी केवलज्ञानवस्था… ऐसे कोई भी अवस्था देखो तो वह ज्ञानशाला के स्वरूप में दिखाई देती है । क्योंकि हरएक अवस्था से अपने को अवश्य प्रेरणा-ज्ञान और कुछ न कुछ जानकारी प्राप्त होती ही है ।

जीवन कैसे जीना चाहिए ? व्यवहार कैसे होना चाहिए ? विनय-विवेक और ढंगसे कैसे रहना ? उतना ही नहीं, बोलना-चलना-खाना-पीना-सोना-बैठना-उठना-रहना आदि सर्व क्रीयाओं के बारे में भगवान के जीवन से मूक प्रेरणा मिल जाती है । पवित्र संदेश प्राप्त हो जाता है, जो अच्छा-उमदा-आदर्श जीवन बनाने के लिए महत्त्वपूर्ण है ।प्रभु का उपदेश भी एक अच्छी पाठशाला है । उत्तराध्ययन में प्रभु ने कहा – ‘अणुसासिओ न कुप्पिज्जा’। मतलब, कोई भी वड़ील-गुरूजन-अनुभवी व्यक्ति आपको अनुशासित करें, अच्छी बात करें… हितशिक्षा का वचन सुनाये, वह मनपसंद न भी हो, कड़वे भी हो… गलती बतानेवालें हो… तो भी गुस्सा न करें । माता-पिता व गुरूजन हमसे बड़े होते है । ज्यादा अनुभवी होते है । वे हमें सुधारने के लिए, उन्मार्ग से सन्मार्ग में लाने के लिए, गलत आदतों से रोकथाम के लिए, दुर्गुणों से बचाने के लिए सतत प्रयत्न शील रहते है । इस प्रयत्नों के सिल सिले में अनेकबार वे हमारी आलोचना करते रहते है । हमें दोषदर्शन कराते हैं । दोषों-दुर्गुणों से बचाने के लिए टोकते है । उपदेश और हितशिक्षा देते है । एक ही अपराध के लिए बार-बार ताड़ना-तर्जना भी करतें है ।

हाँ, ये सब करने में उनके दिलमें दुर्भावना नहीं होती है । अपने अच्छे के लिए ही वे कहा करते है ।उस समय अपने दिल-दिमाग में उनके प्रति रोष-क्रोध नहीं आना चाहिए । वरन ज्यादा सम्मान-बहुमान का भाव होना चाहिए । अगर वे नहीं रहते या ऐसी बातें बताकर नहीं सुधारते तो हमारी स्थिति क्या होती ? वे हमको प्रेम और वात्सल्य भाव से ही समझाते है । बात तो यह होनी चाहिए… हम हमारा जीवन और व्यवहार ऐसे रखे के बड़े-वड़ीलों को टोकने-बोलने की बारी ही न आयें । हमारे जीवन-व्यवहार में दूषण का प्रवेश होता है तब ही उनको हमें झकझोर ने की आवश्यकता खड़ी होती है । वे हमारी भलाई के लिए कठोर कार्यवाही करने के लिए मजबूर होते है या कष्ट उठाते है । हमारे उज्ज्वल भविष्य की चिंता से प्रेरित होकर ही हम पर अनुशासन करते है । नीति में लिखा है – पिता से ताड़ित पुत्र, गुरू से ताड़ित शिष्य और हथौड़ा से ताड़ित किया सोना ही अलंकार बनता हैं । 

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