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भोजन जीवन का एक साधन है, साध्य नहीं : आचार्य महाश्रमण जी

AHINSA KRANTI / RAJENDRA BOTHRA
हैदराबाद। आचार्य महाश्रमणजी ने आज अरोरा कॉलेज में प्रवचन में फरमाया कि आगम में कहा गया है भोजन का परिणाम छह प्रकार का होता है। मनोज्ञ- मन में आल्हाद उत्पन्न करने वाला, रसिक- रस युक्त, त्रिणनीय – रस, रक्त आदि धातुओं में समता लाने वाला, वृग्हणीय – धातुओं को उपचित करने वाला, मदनीय – काम वासना को बढाने वाला, दर्पणीय- पुष्टि कारक। हमारे जीवन के साथ भोजन भी जुड़ा हुआ है शास्त्रकार ने भोजन पर चर्चा की है और बताया है कि भोजन का परिणाम छह प्रकार का होता है यानी भोजन किस प्रकार का होता है और भोजन करने के बाद उसका परिणाम क्या आ सकता है। परिणाम छह प्रकार का है ।
पहला है मनोज्ञ- एक भोजन ऐसा होता है जो मन में आल्हाद करने वाला होता है यानी जिस के प्रति आकर्षण होता है उसको खाने से और उसको देखने से भी मन में आल्हाद उत्पन्न हो सकता है और भोजन अमनोज्ञ भी हो सकता है जिसको देखना वह खाना अच्छा नहीं लगता। शास्त्रकार ने यहां मनोज्ञ भोजन की बात बताई है कि भोजन मनोज्ञ हो परंतु उसकी भी भोजन के समय प्रशंसा ज्यादा नहीं करनी चाहिए ,भोजन के समय शांति रखनी चाहिए ।भोजन की प्रशंसा करने से भी कर्म का बंध हो सकता है और अमनोज्ञ भोजन की निंदा कर दें तो भी कर्म का बंध होता है। तो भोजन के समय समता रखें, यह एक भोजन के समय भी साधना हो सकती है। भोजन का दूसरा परिणाम बताया है रसिक – यह भोजन रस युक्त होता है यानी कुछ भोजन जैसे फल आदि खाने से रस आता है और दूसरा अर्थ यों कर दे भोजन में स्वाद आता है, यह स्वाद आना तो एक सामान्य परिणाम है परंतु स्वाद में आसक्ति आना अलग बात है। बढ़िया से बढ़िया स्वाद आ रहा है तो भी भोजन में हमें आसक्ति नहीं करनी चाहिए, समता रखनी चाहिए ।
जीभ की मांग से खाना नुकसानदेह है जबकि शरीर की मांग से खाना आवश्यकता की पूर्ति है। भोजन तन के लिए है पर तन भोजन के लिए नहीं। भोजन जीवन के लिए है परंतु जीवन भोजन के लिए नहीं। भोजन जीवन का एक साधन है न कि जीवन का साध्य है। तो हम भोजन को एक साधन ही माने ,उसको साध्य का दर्जा न दे । तीसरा परिणाम बताया हैं भोजन का त्रिणनीय, हमारा भोजन रक्त, रस आदि धातुओं में समता लाने वाला होता है, हमारे शरीर में धातुएं हैं उन को पुष्ट करने वाला होता है। चौथा परिणाम बताया है भोजन का वृग्हणीय, यह भोजन का एक प्रकार होता है जो धातुओं को उपचित करने वाला होता है। पांचवा परिणाम बताया है मदनीय, यह भोजन काम वासना को बढ़ाने वाला हो सकता है। छठा परिणाम है दर्पणीय , दर्प को पैदा करने वाला। यह भोजन के छह परिणाम ठाणं आगम के नवें सुत्र में बताए गए हैं। हमें यह ध्यान देना है कि भोजन तो जीवन को चलाने के लिए,शरीर को टिकाने के लिए हमें करना होता है ।भोजन में जितना संयम व समता भाव रखा जा सके, रखना चाहिए। भोजन में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए,भोजन में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए,भोजन करते समय बातें नहीं करनी चाहिए, भोजन में द्रव्य की सीमा रखनी चाहिए, यह भोजन का अच्छा तरीका है। भोजन में हमें यह ध्यान देना चाहिए कि यह मेरी साधना के अनुकूल है या नहीं, साधु को तो विशेष ध्यान देना चाहिए कि मैं ऐसा भोजन लूं जो मेरी साधना के अनुकूल हो, साधना में बाध्य न बने। जैन समाज के लोगों को नॉनवेज भोजन से दूर रहना चाहिए, नॉनवेज वाली दवाई से भी बचना चाहिए। शाकाहार में भी जमीकंद खाने से बचना चाहिए, इन चीजों से बचने से हिंसा से बचा जा सकता है। धार्मिक प्रोग्रामों के भोज में जमीकंद से बचाव का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए, इसी तरह रात्रि भोजन ना करने का भी ध्यान रखना चाहिए, तो हम भोजन में विवेक और संयम रखें यह काम्य है।

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