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नियत अलग होती है और भाग्य अलग होता है:- सुधा सागर जी

AHINSA KRANTI NEWS

दिनांक 4 जुलाई 2019 को स्थापना के दिन बिजोलिया राजस्थान से जैन मुनि सुधा सागर जी महाराज ने कहा की नियत अलग होती है और भाग्य अलग होता है , जो जो कर्म भूमि ने जन्म लेता है वह भाग्य भरोसे रहता है वह कभी सुखी नहीं रह सकता वह कभी सफल नहीं हो सकता जब भी कार्य की शुरुआत करो नियत और भाग्य को अलग रख देना और अपनी आत्मा को कहना मैं जो करुंगा वह होगा , आत्मा को जागृत करो आत्मा की विल पावर बढ़ाओ यह आवाज अंदर से आ गई मैं जो करुंगा वह होगा तुम सफल हो जाओगे एक बार अपनी आत्मा का मंगलाचरण करके देखो आत्मा से कहना इस कार्य की जिम्मेवारी मैंने खुद ली है , भाग्य भरोसे खाने वाले को मोक्ष के दरवाजे बंद हैं मोक्षमार्ग के रास्ते बंद हैं बासी रोटी खाने वालों को धर्म के दरवाजे बंद हैं बासी रोटी खाना अपने जीवन का अपशगुन करना है , बासी रोटी खाने वाला कभी ब्रह्मचारी वृत्ति बन नहीं सकता अट्ठारह कोड़ा कोड़ी सागर वर्ष तक कोई मोक्ष नहीं गया मात्र एक कमी के कारण जितने जीव थे सब भाग्य का खाते थे मोक्ष का दरवाजा जब खुलेगा जब यह बासी नहीं ताजी खाएंगे


मोक्ष आता है श्रम से जैन धर्म का नाम रख दिया श्रमण संस्कृति श्रम का अर्थ है तपस्या मन को तपाओ जो पूरा ड्रम करते हैं ऐसी संस्कृति में चौथे काल में मोक्ष मिलता था परमार्थ भी आज बैठे हुए मिलने वाला नहीं है तुम लोग समझते हो कि महाराज आपके पहले से ही मुनि बनना लिखा था नहीं पुरुषार्थ को जगाया तब मुनि बने पंचम काल में जितने भी मुनिराज है 33 से 50 नंबर ही मिल पाएंगे जो श्रवण कुंदकुंद की मूल आमनाओ को स्वीकार नहीं करते उन्होंने शिथिलता स्वीकार कर ली उनके गुरु ने शिथिलता स्वीकार कर ली कुंदकुंद ने एक फरमान जारी करा मेरी मूल परंपरा में वही नियम चलेंगे जो भगवान महावीर के सिद्धांत थे , इस परंपरा में कुंदकुंद ऐसे हैं जिन्होंने महावीर के सिद्धांत की रक्षा की सबसे पहले कुंदकुंद में सख्ती बरती ब्रह्मचारी महावीर भैया ने बताया कि सुधा सागर जी महाराज का सीकर में 1997 में चातुर्मास हुआ था चतुर्मास इसलिए होता है क्योंकि बारिश के समय जीव की उत्पत्ति हो जाती है और जीवो को कष्ट नहीं हो इसके लिए साधक अपनी साधना को एक जगह निश्चित करते हैं 4 महीने के लिए जिससे कि जीवो की हिंसा नहीं हो इसके लिए साधु संत अपने-अपने स्थानों में 4 महीने के लिए एक निश्चित क्षेत्र में रहकर चातुर्मास करते हैं

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