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प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संस्कृति और इतिहास की जानकारी होना चाहिए -मुनि श्री समता सागर जी महाराज

मध्यप्रदेश अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन
विदिशा(भद्दलपुर)- भारतीय संम्पदा को दौनों तरफ से लुटा है, एक और जंहा विदेशी आकृमणकारिओं ने लूटा, वंही दूसरी ओर स्थानीय आतातायी शासकों द्वारा भारतीय संस्कृति को नष्ट किया गया। उपरोक्त उदगार मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने जैन तत्व वोध की प्रातःकालीन कक्षा में भारतीय इतिहास को वताते हुये व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि विश्व मेंभारतीय पुरातत्व सर्वाधिक प्राचीन एवं विश्वसनीय है।उन्होंने मोहन जोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई का उल्लेख करते हुये कहा कि सन् 1926 में यह खुदाई प्रारंभ हुई, जैसे जैसे यह खुदाई आगे वड़ी उसमें  जैन तीर्थंकर एवं वौद्ध प्रतिमा एवं वैदिक प्रतिमाओं के साथ उस काल चक्र का ज्ञान इतिहास कारों को मिला, एवं
 मात्र पांच हजार पुरानी मानव सभ्यता का इतिहास पता चला, हालांकि जैन इतिहास इससे भी अधिक पुराना है,
इतिहास कार भगवान महावीर, भगवान पार्श्वनाथ,भगवान नेमीनाथ के काल तक को साक्ष्य के रुप में मानते है। उसके पहले के इतिहास के साक्ष्य प्रमाण न होंने से मात्र उसे मात्र जनपथ सत्य के रुप में मानते है।
उन्होंने तीर्थंकर की परिभाषा वताते हुये कहा जो धर्मतीर्थ की स्थापना करे उसे तीर्थंकर कहते है। जैन धर्म का इतिहास वर्तमान के 24 तीर्थंकरों में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से प्रारंभ होता है। उन्होंने युवाओं को सम्वंधित करते हुये कहा कि हमें अपनी मूल परंपरा का ज्ञान होंनाआवश्यक है, “आप दुनिया का ज्ञान तो वहूत रखते है लेकिन जिन सीडीओ पर आप रोज चल रहे है,
यदि आपसे अचानक पूंछा जाए कि आपके घर की कितनी सीड़ीयां है तो आप एकदम नहीं वता पाऐंगे” उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ती को अपने  इतिहास की जानकारी तो होंना ही चाहिये। उन्होंने कहा कि “ज्ञान का महत्व तभी है, जब उसे पड़कर अनुभव में लाया जाऐ,अकेले पड़-पड़-कर ही यदि पूरा जीवन उसमें लगा दिया और उसे अनुभव में नहीं उतार पाऐ तो ऐसे ज्ञान का कोई महत्व नहीं होता” मुनि श्री ने कहा कि “समाज में विचारक का वहूत महत्व होता है, जैसे  स्थिर जल मे एक कंकर फैक दिया जाए तो उसमें तरंग उत्पन्न  हो जाती है,उसी प्रकार समाज में एक विचारक अपने विचारों से सुप्तावस्था में पड़ी समाज को चेतन अवस्था में ले आता है”उन्होंने काल विशेष की चर्चा करते हुये कहा कि भगवान श्री कृष्ण एवं नेमीनाथ भगवान गहस्थ अवस्था के दौनों चचेरे भाई थे, उम्र में नेमीनाथ कृष्ण जी से छोटे थे।
उसके पश्चात भगवान पार्श्वनाथ का काल आता है, तत्पश्चात भगवान महावीर का अंतिम शासन माना जाता है। इस प्रकार से काल गणना की जाती है।हालांकि सामान्यतः प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ स्वामी को लेकर पंचकल्याणक ज्यादातर होते है,तो जैन इतिहास में उनका कथन ज्यादा मिलता है, उन्होंने कहा कि जैन धर्म में २४ तीर्थंकर हुये है, जिनका विहार समूचे विश्व में हुआ था।
उन्होंने अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर के संद्रभ में चर्चा करते हूये कहा कि वह 72 वर्ष की आयु लेकर आए थे,वर्तमान विहार प्रान्त के पावापुरी में उनका निर्वाण हुआ। उनके विवाहिक जीवन पर चर्चा करते हुये मुनि श्री ने कहा कि स्वेताम्बर परंपरा में इसका उल्लेख मिलता है, लेकिन दिगंबर परंपरा उसे स्वीकार नहीं करता वह वाल व्रहम्चारी थे, हां तीस वर्ष की उम़ में उनके विवाह की चर्चा अवश्य चली थी। उनका पहला आहार कूल ग्राम के राजा के यंहा हुआ एवं अंतिम आहार चंदनवाला के यंहा हुआ था जो कि उनके पारिवारिक रिस्ते में महावीर की मौसी थी। मुनि श्री ने भगवान महावीर का इतिहास वताते हुये कहा कि ऋतुकूला नदी के किनारे उनको एक वृक्ष के नीचे केवलज्ञान वैसाख सुदी दसमी को हुआ, लेकिन 66 दिन निकल गये और जब उनका उपदेश शुरू नहीं हुआ तो अचानक खलवली मच गई, सौधर्म इन्द्र ने पाया कि उनकी वाणी को समझने वाला कोई ज्ञानी पुरुष नहीं था, जब राजगृही विहार के विपुलाचल पर्वत पर उनका समवसरण लगा हुआ था तो भगवान महावीर के ज्ञान की प्रशंसा सुन अपने ज्ञान को सुनाने के लिये एक ब्राह्मण इन्द्रभूती गौतम  वंहा पर आया, जैसे ही वह भगवान महावीर के समवसरण में पहुंचे, उनके ज्ञान का मान गल गया, और उनके अंदर की अज्ञानता छंट गई, वह भगवान महावीर के प्रथम दीक्षित शिष्य वन जैन धर्म के प्रथम गुरू गणधर गौतम स्वामी के नाम से ख्याति प्राप्त हुये।
कार्तिक सुदी एकम् को कैवल्यज्ञान को प्राप्त कर जन जन में उस ज्ञान को प्रसारित किया। जो परंपरागत आचार्यौ के पास से आती हुई वर्तमान में आप सभी के पास मौजूद है। सावन वदी एकम् से उनके उपदेश शुरु हुऐ और उसी दिन से वीर शासन जयंति प्रारंभ हुई।
इस अवसर पर श्रावकों में श्रैष्ठ ऐलकश्री निश्चयसागर जी महाराज ने “कुंद कुंद के कुंदन” धर्म ग्रन्थ की व्याख्या करते हुये सम्यग्दर्शन के आठ अंग निर्विचिकित्सा और अमूड दृष्टी अंग का उपदेश दिया। उन्होंने कहा कि एक सम्यक दृष्टि जीव कभी भी किसी मुनि के घृणित शरीर को देखकर उससे घृणा नहीं करता।
चातुर्मास कमेटी के मीडिया प्रभारी अविनाश जैन ने वताया कि वर्तमान समय में कोरोना रोग के चलते हुये शोसल डिस्टेंस के साथ मुनि श्री एवं ऐलक श्री के द्वारा जैन धर्म का इतिहास और रत्नात्रय धर्म के पालन करने हेतु कुंद कुंद का कुदन का स्वाध्याय प्रतिदिन7:45 से9:45 तक कराया जा रहा है।
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