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जैन शासन में साधुत्व की आचार मर्यादाएं : आचार्य श्री महाश्रमणजी

अहिंसा क्रांति / राजेन्द्र बोथरा

आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज अरोरा कॉलेज,हैदराबाद में प्रवचन में फरमाया की ठाणं  आगम के छठे स्थान में कहा गया है, एक बात बताई गई है इस सूत्र में कि कल्पस्थिति छह प्रकार की होती है। जैन शासन में निर्ग्रंथ प्रवचन में जो 24 तीर्थंकरों की श्रृखला है, इस शासन में साध्वाचार की विभिन्न श्रेणियां, व्यवस्थाएं, मर्यादाए रही है। छह प्रकार की आचार मर्यादा, आचार व्यवस्था, साधना व्यवस्था बताई गई है, पहली है सामायिक कल्पस्थिति, भगवान पार्श्व  के समय साधु सामायिक संयम की साधना करते थे ।

पांच चारित्र है, सामायिक चारित्र, छेदोपस्थापनीय चारित्र, परिहार विशुद्धि चारित्र, सूक्ष्म सम्पराय चारित्र और यथाछाज चारित्र।इनमें जो दूसरा चारित्र है छेदोपस्थापनीय, वह वर्तमान में सम्मत है ,यानी भगवान महावीर की परंपरा में यह सम्मत है। प्रथम व अंतिम तीर्थंकर को छोड़कर बीच के 22 तीर्थंकरों के शासन में साधुपन की व्यवस्था मैं यह छेदोपस्थापनीय चारित्र नहीं था,उनमें सामायिक चारित्र होता था यानी छेदोपस्थापनीय चारित्र बिल्कुल नहीं था। भगवान महावीर का वर्तमान में यह जैन शासन चल रहा है इसमें मुख्यतया छेदोपस्थापनीय ही है। प्रारंभ में सामायिक चारित्र भी ग्रहण कराया जाता है, दीक्षा जब लेते हैं तब कुछ समय के लिए सामायिक चारित्र का प्रत्याखान कराया जाता है, तो वर्तमान में यह सामायिक चारित्र का अस्तित्व है।

हर साधु के लिए प्रारंभ में वही स्वीकरणीय होता है परंतु बाद में वह छूट जाता है और बड़ी दीक्षा के बाद छेदोपस्थापनीय आ जाता है।सामायिक कल्पस्थिति है सर्व सावध योग का त्याग इसमें होता है और यह एक आचार्य मर्यादा है, सामायिक चारित्र में और छेदोपस्थापनीय चारित्र में थोड़ा थोड़ा आचार का भेद होता है, तो सामायिक कल्पस्थिति एक है, और दूसरी है छेदोपस्थापनीय कल्पस्थिति, इसमें पांच महाव्रतो को त्याग के रूप में स्वीकार किया जाता है, यह वर्तमान में चालू है। वर्तमान में हमारे यहां साधुओं में छह में से तीन कल्पस्थितियां होती है।तीसरी कल्पस्थिति है निर्विष्मान और चौथी है निर्दिष्ट कल्पस्थिति ।

पांच चारित्रों में तीसरा है परिहार विशुद्धि चारित्र ,उसके दो विभाग हैं, एक साधना का प्रयोग है इसमें नौ साधुओं का समूह संलग्न होता है ,नौ में से चार साधु तपस्या में लग जाते हैं और चार साधु परिचर्या सेवा का निर्वहन करते हैं और एक साधु आचार्य के रूप में होता है। अब जो चार साधु तपस्या में लगे हैं उनकी है निर्विष्मान कल्पस्थिति, बाद में उनकी तपस्या संपन्न हो जाती है तो दूसरे जो सेवा में थे वह तपस्या में लग जाते हैं और जिन्होंने तपस्या कर ली वे सेवा में लग जाते हैं जिनकी तपस्या संपन्न हो गई वह निर्दिष्ट कल्पस्थिति वाले हो गए।पांचवी है जिन कल्पस्थिति, यह एक संघ मुक्त होकर साधना, अकेले रहकर साधना करने का प्रयोग है ।जिन साधु में पूर्वो का ज्ञान हो, योग्यता हो, क्षमता हो ,सहिष्णुता हो, ऐसा साधु संघ मुक्त होकर इस जिन कल्पस्थिति को स्वीकार करके अकेला साधना करता है ,इस  जिन कल्पस्थिति में आचार्य भी संघ मुक्त होकर, उत्तराधिकारी की नियुक्ति करके साधना कर सकते हैं। जिन कल्पस्थिति में साधना करने वाले साधु उदीर कर कष्ट लेते हैं, वे कांटा चुभे तो भी निकालने का प्रयास नहीं करते और बीमार हो जाए तो भी किसी प्रकार की चिकित्सा नहीं लेते हैं। 

छठी है स्थविर कल्पस्थिति, संघ में रहने वाले साधु यह साधना कर सकते हैं ,यह सामान्यतया संघबद्ध साधना होती है।तो यह छह कल्पस्थितियां जैनशासन की साधुत्व की आचार मर्यादाए हैं। तो आचार साधना मोक्ष के लिए है। आप लोग जो गृहस्थ हैं, साधु की अवस्था में नहीं है, इन छह में से तो आप कोई है नहीं, श्रावक हो सकते हैं संयमासंयमी व्रताव्रती, बाल पंडित आदि ।श्रावक का संयम ,त्याग है व्रत है। तो गृहस्थ जीवन में कैसे आचार संयम का विकास हो, आप त्याग संयम को बढ़ाने का प्रयास करें ,एक सीधा सा उपाय है सामायिक करो, सामायिक में सावध है योग का त्याग है, जितनी सामायिक करेंगे आपके उतने सावध  योग के त्याग हो जाएंगे । सामायिक के अलावा 12 व्रतों को स्वीकार करें , पौषध करें, साधु को दान देंगे तो वह भी एक अध्यात्मिक, धार्मिक लाभ का काम हो सकेगा ।गृहस्थ जीवन में संयम व तप के द्वारा, नैतिकता व ईमानदारी से संयम की चेतना का विकास हो सकता है।

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