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परिवार के माली बने मालिक नहीं : देवेंद्रसागरसूरि

अहिंसा क्रांति न्यूज़

आचार्य श्री देवेंद्रसागरजी ने कहा की अच्छे संस्कार सुदामा की दस्तक की भांति होते हैं जो कृष्ण को भी नंगे पांव दौड़ने के लिए विवश कर देते हैं। संस्कारों का यह उपहार परिवार से ही मिलता है। विद्यालयों में शिक्षा मिलती है। परिवार में संपूर्ण संस्कार मिलता है। परिवार एक बगीचा है और माता-पिता इस बगीचे के माली। आचार्य श्री आगे बोले की युग बड़ी तेजी से बदल रहा है और बदल रही हैं सारी मान्यताएं और सारे मूल्य। बदलते हुए परिवेश में बच्चों के अपने विचार हैं। इसीलिए माता-पिता को चाहिए कि वे उन पर अपने विचार न थोपें। बच्चों के शरीर को घर में रखा जा सकता है, लेकिन उनकी आत्मा, उनके विचारों को नहीं। उनकी आत्मा, उनके विचार भविष्य के भवन में रहते हैं। उन्हें अपने अनुरूप बनाने की चेष्टा कभी नहीं करना। क्योंकि जीवन कभी पीछे की ओर नहीं जाता और न ही बीते हुए कल के साथ रुकता है। समय-समय पर उन्हें अपने अनुभवों के आधार पर सचेत और प्रोत्साहित अवश्य करते रहना चाहिए।


माता-पिता को चाहिए कि वे परिवार के माली ही बने रहें, मालिक बनने की न सोचें। शारीरिक और मानसिक परिवर्तन जीवन पर तीव्रता से प्रभाव डालता है। यही कारण है कि इस आयु में आते-आते युवा पीढ़ी को अपनी स्वतंत्रता का अहसास होने लगता है। वे माता-पिता की ज्यादा रोक-टोक पसंद नहीं करते। अधिक दखलंदाजी से दूरियां बढ़ जाती हैं। यह एक ऐसी आयु होती है जहां माता-पिता को बहुत ही धैर्य, सहिष्णुता और प्रेम के साथ व्यवहार करने की आवश्यकता होती है। मां का मृदु स्पर्श जीवन का निर्माण करता है तो पिता की स्नेहिल छत्रछाया से मानसिक क्षमता का विकास होता है। संतान को माता-पिता से मिले इन उपहारों की तुलना सृष्टि की किसी भी संपदा से नहीं हो सकती।माता पिता स्वयं को उनके रोल मॉडल के रूप में इस तरह से प्रस्तुत करें कि वे कह उठें, मां मेरे लिए मदर-नेचर है और पिताजी मेरे लिए फादर-फ्रेंड। यह तभी संभव है जब संतान के समर्थ, संस्कारवान हो जाने पर माता-पिता अपने को माली नहीं मुनि के रूप में स्थापित कर लें। परिवार में रहें किंतु परिवार का कर्ता होने का न तो अभिमान रखें और न ही प्रदर्शन करें। 

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