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इच्छाएं नहीं, गलत इच्छाएं जीवन में परेशानी का कारण बनती हैं : देवेंद्रसागरसूरि

AHINSA KRANTI NEWS

आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने परमात्मा को पाने का मार्ग प्रशस्त करते हुए कहा की प्रभु पाने का सबसे बड़ा आधार है प्रेम। प्रेम से हम किसी को पा सकते हैं, अपना बना सकते हैं। इस बात को हम दूसरी तरह से भी कह सकते हैं कि हम जो चीज पाना चाहते हैं उसे मन की गहराई से अथवा सच्चे मन से चाहें। अगर हम सच्चे मन से किसी चीज को चाहेंगे तो वह अवश्य ही उपलब्ध हो जाएगी। प्रेम सच्चा हो तो मिलन में देर नहीं लगती। हमारी सच्ची चाहत ही वस्तुओं अथवा परिस्थितियों को आकर्षित कर उन्हें सुलभ बनाती है। उत्तम स्वास्थ्य अथवा प्रसन्नता भी इसका अपवाद नहीं। आचार्य श्री आगे बोले की


यदि हम अच्छे स्वास्थ्य व प्रसन्नता की कामना करेंगे तो परिस्थितियां अच्छे स्वास्थ्य व प्रसन्नता के अनुकूल होकर हमारी इच्छापूर्ति में सहायक हो जाएंगी। कहा गया है कि शक्करखोरे को शक्कर और टक्करखोरे को टक्कर मिलती है। हम जो कुछ खाना पसंद करते हैं वही बाजार से खरीद कर लाते हैं। जो खरीद कर लाते हैं उसकी स्पष्ट छवि पहले से ही मन में निर्मित कर लेते हैं। यदि ऐसा नहीं करते तो गलत चीज की खरीदारी की संभावना बढ़ जाती है। हम शक्करखोरे बनने की कामना करें न कि टक्करखोरे बनने की। यही चयन हमारी नियति निर्धारित कर हमें योग्य-अयोग्य अथवा सफल-असफल बनाता है। जिस प्रकार अच्छी फसल पाने के लिए उत्तम किस्म का बीज बोना अनिवार्य शर्त है, उसी तरह अन्य कुछ भी पाने के लिए उस चीज की मजबूत चाहत, यानी मन में दृढ़ इच्छा का बीजारोपण भी अनिवार्य है।

जब हम कोई बीज बो देते हैं तो उससे पेड़ उगना स्वाभाविक है। बीज बो देने के बाद उसे उगने से रोकना असंभव है। बिल्कुल इसी तरह से विचार रूपी बीज को वास्तविकता में परिवर्तित होने से रोकना भी असंभव है। यदि किसी भी तरह से अच्छे विचार रूपी बीजों का मन में रोपण कर दें तो उसके परिणाम को कोई नहीं रोक पाएगा। स्पष्ट है कि जैसी चाहत होगी वैसी ही उपलब्धि होगी। जीवन को संवारना है तो अच्छी सोच अथवा शुभ संकल्प अनिवार्य हैं। तभी तो कामना की गई है कि मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।
यदि हमारी इच्छाएं सात्विक नहीं हैं तो परिणाम भी सात्विक नहीं होंगे। जो भी ये कहते हैं कि इच्छाएं जीवन में परेशानी का कारण बनती हैं, गलत कहते हैं। गलत इच्छाएं जीवन में परेशानी का कारण बनती हैं न कि इच्छाएं। जीवन को संवारना है तो इच्छाओं को संवारना होगा। अस्वस्थ भावों का त्याग करना होगा तथा स्वस्थ भावधारा का चुनाव या निर्माण कर उसे पोषित करना होगा। उसे दूसरे दूषित भाव-बीजों से रक्षित करना होगा। 

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