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बच्चों से मित्रतापूर्ण व्यवहार करना चाहिये – मुनि श्री विनम्र सागर जी महाराज

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अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन


विदिशा – ज्ञानी दर्द को सहता है,ओर सोचता है कि में सिद्ध कब वनूंगा जबकि अज्ञानी दर्द में अपनी इस देह को नष्ट करना चाहता है, कष्ट कितने भी हों इस पर्याय को नष्ट करने से समाधान नहीं होता लोग छोटी छोटी समस्याओं में आत्महत्या करने का सोचने लगते है समस्याओं का अंत आत्महत्या नहीं वल्कि उनका समाधान है।”इस पर्याय की इति कव होगी? इस काया कि च्युति कब होगी मां” वार्तालाप माटी अपनी धरती मां के सम्मुख कह रही है।उपरोक्त उदगार मुनि श्री विनम्र सागर जी महाराज ने अरिहंत विहार जैन मंदिर में प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये। मुनि श्री ने कहा कि कई कई बार देखने में आता है कि घर केअंदर रहते है और घुटन महसूस करते है,और कभी कभी तो घुटन इतनी बड़ जाती है कि वरदास्त नहीं होता, एक सीमा तक तो आप सहते है, लेकिन कभी कभी जब सह नहीं पाते तो वह ज्वालामुखी के रुप में वह बात सामने आ जाती है। आचार्य गुरूदेव यंहा पर धरती को मां और माटी को वेटी के रुप में प्रस्तुत कर उस गोपनीय वार्तालाप को प्रस्तुत कर कह रहे है कि गोपनीय बात को सबके सामने नहीं कही जाती लेकिन सहने की भी एक सीमा होती है बात जब सहनशीलता से आगे चली जाती है,तो वह ज्वालामुखी के रुप में फूट पड़ती है।मुनि श्री ने कहा कि बच्चों से मित्रतापूर्ण व्यवहार करना चाहिये वच्चे जब छोटे होते हें तो अपनी सभी बातें मां से कह देते है, लेकिन वही वच्चे जब बड़े हो जाते है तो अपनी बातों को छुपाने लगते है उसका कारण है यह है कि आपने अपने बच्चों से वह विश्वास और मित्रता हांसिल नहीं की है और समाधान पाने के लिये वही बात बाहर करने लगते है। मूक माटी में कृतिकार करुणा रस का प्रवाह करते हुये मांटी और धरती का सम्वाद प्रस्तुत कर रहे है, असंयमी लोग ही संयमी कि उपेक्षा और अपमानित करते है। बाहर का तिरस्कार तो आदमी फिर भी सह जाता है, लेकिन घर के लोगों के द्वारा अपमान की यह श्रंखला निरंतर चलती है तो वह धरती भी ज्वला मुखी के रुप में फूट पड़ती है, आजकल प्रत्येक परिवार की स्थिति यह हो गयी है कि घर के अंदर ही नरक का बातावरण उपस्थित कर दिया जाता है।मुनि श्री ने कहा किअपने दुःख का प्रगटीकरण हर व्यक्ती के सामने नहीं करना चाहिये दुःख वंही प्रकट करो जो आपके जीवन का उत्थान चाहते हो,वरना आपका दुःख आपका मजाक वन कर रह जाऐगा। हम लोगों के सामने कई लोग आते है और अपने उस पाप और अधर्म को वता जाते है जिससे उनको समाधान मिल सके। हम लोग भी उनके दुःखों को सुनते है,और समाधान देते है। आपने आजतक अपने दुःख को उन्ही लोगों को सुनाया है जो स्वं पराक्रम से रीते है,और विपरीत है,उन लोगों के सामने अपनी वेदनाओं और पीड़ाओं को कहा है, इसलिये ही तो समाधान नहीं हो सका।और यह वेदनाऐं और पीड़ाऐं बड़ती चली गयी। मुनि श्री कहा कि जिनके पास पराक्रम और विवेक होता है वही इस प्रकार से अपने दुःख और वेदना पी पाते है,आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महाराज का हायकू है “अपना दर्द कहा नहीं जाता सहा जाता है” जो ज्ञानी होते है वह दूसरों के सामने अपने घर की पीड़ा को इसलिये व्यक्त नहीं करते कि कंही हमारे दुःख और पीड़ा से हमारे अपने भी परेशान न हो जाएं। उपरोक्त जानकारी श्री सकल दि. जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ने दी।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन विदिशा,मध्यप्रदेश
संपर्क – 7828782835/8989696947

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