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कोरोना के बीच चातुर्मास और अपना विवेक: डॉ वरुण मुनि*


अखिल भारत वर्ष में विचरण कर रहे समस्त श्रमण श्रमणियों के संग सभी परम्परा सम्प्रदाय के महर्षियों का शीघ्र ही चातुर्मास शुभारम्भ होने जा रहा है । *संघ नेतृत्व में सक्षम सभी आचार्यों ने अपने नेश्राय के सभी साधु साध्वियों को चातुर्मास के सम्बंध में विशेष निर्देश आज्ञा दी है* । हर वर्ष की तरह होने वाले इस चातुर्मास में अबकी बार कुछ नया अनुभव सभी को प्राप्त होने वाला है । *जैसा कि महामारी के चलते , प्रशासन के निर्देश से सभी कार्यक्रमों में परिवर्तन हो गया है। तो चातुर्मास के कार्यक्रमों में परिवर्तन होना भी तय है ।चातुर्मास – जो अध्यात्म की पावन गंगा बहाने आता है । सोये मन को जगाने आता है ।

*भगवान महावीर के पावन उपदेशों से कषायों के उपशम करने आता है* ।  सम्पूर्ण भारत में चातुर्मास को लेकर एक विशेष उत्साह नजर आता रहा है और चातुर्मास मंगल प्रवेश को लेकर लोगों का रूझान भी बढ़ा चढ़ा रहता है । परंतु इस बार वो सारे नजारे नजर में नहीं आने वाले इसका कारण है –  कोरोना महामारी । सभी जानते हैं कि इस महामारी ने शादी विवाह से लेकर सभी चकाचौंध से भरे धार्मिक कार्यक्रमों पे भी अंकुश लगा दिया है । *भव्यता पर नियंत्रण कर लिया है ।*चातुर्मास शब्द का शायद इस बार सम्यक विवेचन होते हुए *सिर्फ चार माह का प्रवास ही हो* ।सर्वप्रथम जो चातुर्मास है वो हमारे आत्म विकास हेतु उपस्थित होता है , निश्चित रूप से ये महामारी हमारी आत्म साधना में बाधक नहीं बनेगी परन्तु जो धर्म प्रभावना का स्वरूप है वो बदल जायेगा ।

जो लोग एक छत के नीचे धर्म साधना करते आये है , उन सभी के लिए ये महामारी सुनहरा अवसर लेकर आया है वो अवसर है अपने घरों को धर्म केंद्र बनाने का , जी हां । हमेशा से साधु संत महात्मा कहते आये हैं कि घर को धर्मस्थल बनाओ और सम्भव है वो सपना इस बार सच हो सकता है । *जो बच्चे , युवा स्थानक मंदिर का मुंह देखना पसंद नहीं करते हैं शायद वो भी इस बार धर्म से जुड़ सकेंगे* । जैसा कि पूज्य आचार्य भगवन्त ने निर्देश दिया है कि भीड़ से परहेज करें । सच में इस बार हमें संसार के भीड़ से परहेज करना है । *परहेज सिर्फ और सिर्फ भीड़ से करना है । और इसी भीड़ में हमें हमारी आत्मा को खोजना भी है ।*  *कुछेक के प्रश्न होते हैं कि* चातुर्मास है लोग साधु संतों के पास ज्यादा धर्म ध्यान सीखते हैं सभी को स्थानक में जाना चाहिए उन सभी बन्धुओं से नम्र उत्तर देना चाहता हूं बन्धुओं निश्चित रुप से साधु संतों के निकट धर्म की प्रभावना अधिक होती है परंतु इस बार की परिस्थितियां प्रतिकूल है और जो लोग धर्म के नाम पर भीड़ इक्कठी करना चाहते हैं उनसे कहना है कि *इस भीड़ से कही अपना धर्म औरों की नजरों में निंदा का पात्र ना बन जाये ।* 

*स्थानकों की जहाँ तक बात है तो वहाँ वही लोग आएंगे जो हर वर्ष आते हैं। जिनका वैराग्य कभी जगने वाला नहीं होता है* । हर साल प्रवचन बड़े बड़े महापुरुषों के होने के बावजूद लोग मोह की नींद से नहीं जगे तो इस बार *प्रतिकूलता में प्रवचन सुनकर क्या करने का विचार है* । अतः हमें स्वयं के विवेक को जगाते हुए सभी साधु साध्वी श्रावक श्राविका को सरकारी निर्देशों को अपनाते हुए भीड़ से परहेज करना चाहिए ।

सामाजिक दूरी को अपनाते हुए अगर किसी प्रकार का धार्मिक सेशन चलाते भी हैं तो उसमें भी हमें अपने विवेक से 20 या 25 से ज्यादा व्यक्तियों को एक पारी में इकट्ठा नहीं करना चाहिए । *अलग अलग सेशन करके इस बार प्रवचन की बजाय अधिक से अधिक लोगों को धार्मिक ज्ञान कंठस्थ करवाने की प्रेरणा दी जाये , समर्थों को तपस्या की प्रेरणा दी जाये , वृद्ध श्रावकों को स्वाध्याय के पथ पर अग्रसर किया जाए तो निश्चित रूप से अतीत के चातुर्मासों से अधिक धर्म की प्रभावना और उपलब्धि प्राप्त होगी ।*


अगर कोई जानबूझकर भीड़ इकट्ठा करना चाहे तो श्रावक श्राविका वर्ग प्रबुद्ध बनकर , धर्म के सम्मान को बरकरार रखते हुए *चातुर्मास प्रवेश पर श्रावक संघ के 11 सदस्य श्राविका संघ से 11 सदस्य मिलकर प्रवेश करवाते हैं तो निस्संदेह चातुर्मास प्रवेश अनुमोदनीय बन जायेगा और चहुं ओर अनुकरणीय बन जायेगा* । ऐसी भीड़ से कोई लाभ नहीं जहाँ पर धर्म के सम्मान पर आंच आये शेष प्रबुद्धजनों के अपने अपने विचार ।इस बार तो चातुर्मास भी चार माह का ना होकर पांच माह का है , तो कहते हैं कि ये *एक महीना बोनस के रूप में है* । मैंने सुना है कि लोग बोनस छोड़ते नहीं है तो हा इस बार एक माह अतिरिक्त रूप में मिले इस बोनस को भी उपयोग में लेना है ।
गुरु अमृत शिष्य – डॉ वरुण मुनि चातुर्मास स्थल – शास्त्री नगर भीलवाड़ा राज.

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