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काया के मौन से साधना शुरू करके मन के मौन तक पहुँचना है : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा 

अहिंसा क्रांति / दलीचंद श्रीश्रीमाल

मैसूर ।  श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास कर रहे आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वरजी तथा साध्वी भद्रिकाश्रीजी ने प्रवचन में कहाँ कि मानव का शरीर और वचन का व्यापार जितनी तेजी से चलता है, उससे । मन बंदर जैसा चपल भी है । काया को ताला में रखना आसान है, वचन का का मौन भी सुगम है । अपितु मन का मौन करना योगीयों के लिए भी आसान नहीं है । कायासे गुना करने पर तुरंत सजा मिलती है । वचन से गुना करने पर यानी असत्य-गलत-कर्कश-अप्रिय वचन के उच्चारण से भी सजा तुरंत मिलती है । लेकिन मन के अशुभ विचारों की, गलत सोच की, दुर्ध्यान की सजा तुरंत न मिलने के कारण मन के विचारों की यात्रा हमेशा चालु ही रहती है ।   काया के मौन से साधना शुरू करके मन के मौन तक पहुँचना है ।

 

 

 

मन के मौन से ही सिद्धि प्राप्त होती है । मन ही तो पापों की, दु:खों की जननी है । आनंदघनजी नाम के योगीराजने अपने अनुभवों के तौर पर बहुत अच्छीबात बताई है – मन नपुंसकलिंग में होने के बावजूद सब मर्दो को भी अपने बस में रखता है । इतना ही नहीं मर्दों को और स्त्रीओं को भी पछाड़ने का काम करता है ।  जैनग्रंथो में एक बात वो भी लिखा है कि – मन ही कर्मबंध का कारण है तो मन ही कर्ममुक्ति का कारण है । इस बंध और मुक्ति में मुख्य कारण मन के परिणाम है । शास्त्रकार भगवंत इस बात को समझने के लिए अच्छा दृष्टांत देते है । एक पति अपनी पत्नी को आलिंगन करता है, उसी तरह अपनी पुत्री को भी आलिंगन देता है, लेकिन दोनों के आलिंगन में सोच-भाव अलग होते है । वैसे मन के विषय में भी समझना है ।

 

 

 

 

एक सज्झाय में लिखा है – मनोयोग इतना बलवान है कि क्षण में नरक में ले जाकर डाल सकता है, क्षण में पहुंचा देता है । मन जगत में दिखता नहीं है, फिर भी कितनी ताकत रखता है ? ले जाकर डाल सकता है । क्षण में मुक्ति में पहुँचा देता है । मन जगत में दिखता नहीं है, फिर भी कितनी ताकत रखता है ? अनंतशक्ति वाली आत्मा के ऊपर विजय हौसिल कर लेता है ।  योग शास्त्र में श्री हेमचन्द्राचार्यजी लिखते है – अगर आपको मुक्ति में जाना है तो पूरे विश्व में परिभ्रमण (स्वेच्छाचार से)करने वाले लंपट मन को प्रयत्न से बस करना होगा । वायु के ऊपर निग्रह जैसा कठिन है – उसी तरह मन का निग्रह काफी मुश्किल है । हाँ, उसको अपने क़ब्ज़े में लेना है तो अभ्यास और वैराग्य दो साधन है । अभ्यास करने से और वैराग्य को बढ़ाने से निश्चित मन के ऊपर विजयी बन सकते है । ऐसी विजयी दशा प्राप्त करें, यही मंगल कामना ।

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