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*प्रायश्चित से आत्मा की शुद्धि हो सकती है : आचार्य श्री महाश्रमण जी

अहिंसा क्रांति न्यूज़ / राजेन्द्र बोथरा

7 जुलाई 2020 जैन आगम में 11 अंग है और उनमें एक अंग आगम है ठाणं। ठाणं आगम के छठे स्थान के 101 वें सूत्र में बताया गया है कि साधु का अपना आचार होता है, साधु के पांच महाव्रत हैं। पहला महाव्रत है प्राणातिपात, प्राणियों के प्राणों का अतिपात नहीं करना, तीन करण तीन योग से जीवन भर हिंसा नहीं करना। दूसरा सर्व मृषावाद विरमण महाव्रत, पूर्णतया मृषावाद ,  झूठ बोलने का जीवन भर के लिए वर्जन होता है। तीसरा अदत्तादान, सर्व अदत्तादान विरमण महाव्रत , पूर्णतया चोरी का त्याग, चौथा सर्व मैथुन विरमण महाव्रत, पूर्णतया मैथुन सेवन का परित्याग ,पांचवा सर्व परिग्रह विरमण महाव्रत, पूर्णतया रुपया पैसा आदि परिग्रह रखने का परित्याग। शास्त्र में यहां एक बात बताई गई है, साधु का अपना आचार है, अब कोई एक साधु दूसरे साधु पर आरोप लगा दे कि तुमने यह गलती की है ,तो शास्त्रकार ने यहां छह प्रकार के आरोप बताए हैं

,कैसे? किसी साधु के लिए, दूसरा साधु कह दे कि इसने प्राणातिपात किया है, हिंसा की है,प्राणातिपात संबंधी आरोपात्मक वचन बोलने वाला, दूसरा मृषावाद संबंधी आरोपात्मक वचन बोलने वाला कि उसने झूठ बोला था यह आरोप लगा दिया, यह दूसरा आरोप करने वाला व्यक्ति है ,तीसरा अदत्तादान  संबंधी आरोपात्मक वचन बोलने वाला, उस साधु ने चोरी की है, यह तीसरा आरोप लगाने वाला व्यक्ति हो गया, चौथा अब्रह्मचर्य संबंधी आरोपात्मक वचन बोलने वाला, अमुक साधु ने यह अब्रह्मचर्य की गलती की है, यह चौथा आरोप लगाने वाला व्यक्ति हो गया, पांचवा कोई कहदे कि यह साधु तो नपुंसक है यह आरोप लगा दे, छ्ठा दास होने का आरोप लगाने वाला, यह तो दास है ।यह छ प्रकार के आरोप यहां बताए गए हैं। आरोप लगाकर उसको प्रमाणित न कर सके अगर तो आरोप लगाने वाला दोष का भागी है ।

एक बात और बताई गई है कि जो आरोप लगाने वाला है, हो सकता है आरोप झूठा हो, वह अपने आरोप को सिद्ध करने का प्रयास करता है, प्रयास किया पर प्रमाणित नहीं कर सका, फिर प्रयास किया, सिद्ध नहीं कर सका, तो आगे से आगे उसको ज्यादा प्रायश्चित मिलता जाएगा। तो आरोप लगाओ तो उसका प्रमाण भी होना चाहिए। हमारे यहां एक व्यवस्था है कि कोई साधु किसी दूसरे साधु में गलती देखें, दोष देखे तो तुरंत उसे बता दो, गुरु को बता दो, यह गलती की है। कोई साधु गलती को बताता नहीं है छुपाके रखता है, कुछ सालों बाद बताता है कि अमुक साधु ने यह गलती की है,अब वह साधु बोले कि गुरुदेव मुझे तो याद नहीं है कि ऐसी गलती मैंने की है, तो जो आरोप लगा रहा है उसका इरादा सही नहीं है क्योंकि उसने समय पर सही बात नहीं बताई। साधु संस्था में किसी के सुधार का लक्ष्य हो, किसी को बदनाम या प्रताड़ित करने की दुर्भावना या लक्ष्य नहीं होना चाहिए। साधु से भी गलतियां हो सकती है

परंतु किसी पर गलत आरोप नहीं लगाना चाहिए और गलती है तो खुद को भी अपने दोष का प्रायश्चित करने का मनोभाव रखना चाहिए कि मेरा प्रायश्चित हो जाए ताकि आत्मा मेरी शुद्ध रह सके। प्रायश्चित में सरलता की भी महत्ता है, गलती हो गई है तो सरलता से जितनी बात प्रायश्चित देने वाले के सामने रखोगे तो शुद्धि अच्छी हो सकती हैं, अगर कपट है मन में तो शुद्धि में कठिनाई हो सकती है। शुद्ध भाव से कहो, अगर गलती है, मेरे से गलती हो गई, तो शुद्धि हो सकती हैं। इसलिए हम चारित्र आत्माओं के लिए धातव्य है , झूठा आरोप लगाने का तो मानो सपना ही नहीं आना चाहिए, सही आरोप भी लगाए तो प्रमाण चाहिए , तो ज्यादा अच्छा हो सकता है। तो चित्त शुद्ध हो, किसी को बदनाम करने का इरादा नहीं ,इरादा हो तो सुधार परिष्कार का हो, यह साधु में और ग्रहस्थों में भी होना चाहिए।

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