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पाप का प्रायश्चित्त और पश्चाताप करती है, तो अवश्य शुद्ध होती है : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म.सा

AHINSA KRANTI NEWS
मैसूर । 27 जुलाई श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास कर रहे आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वरजी तथा साध्वी भद्रिकाश्रीजी ने प्रवचन में कहाँ कि  दान से धर्म का प्रारंभ होता है।  आगे जाकर शील – सदाचार में प्रवेश होता है। तप के साथ धर्म पूर्णता की और आगे बढ़ता है।  भाव तो तीनों में जुड़ना चाहिए। अगर भाव सही ढंग से दान – शील – तप के साथ नहीं जोड़ा तो दानादि धर्म नहीं बन सकता।  यदि धर्म नहीं बना तो आत्मकल्याण के बजाय संसार बढ़ने का काम होता हैं।  धर्म तो इसका नाम है जो संसार को काटने का और  मुक्ति  की ओर प्रगति कराने का काम करना हैं।
त्रिषष्टि ग्रंथ में कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्यजी लिखते है – धर्म ही उत्कृष्ट मंगल हैं।  स्वर्ग और मोक्ष देने वाला धर्म हैं।  संसाररूपी जंगल से पार उतरने का रास्ता दिखाने वाला ‘गाइड’ हैं।  पुष्पों का समूह दो-तीन घंटों में मुरझा जाता हैं।  चंदनादि का शरीर पर किया विलेपन  या इत्र-परफ्यूम   एक ही दिन में दुर्गंधि हो जाता है।  कितने भी अच्छे वस्त्र क्यों न हों – कुछ ही वर्षों में जीर्ण हो जाते हैं।  लेकिन धर्म की की हुई आराधना कभी जीर्ण नहीं होती।  कभी निष्फल नहीं जाती।
परमार्हत कुमारपाल महाराजा ने तो भगवान को प्रार्थना करते  हुए वहाँ  तक कहा था कि – धर्म रहित अगर चक्रवर्ती का पद मिलता है तो मुझे मंजूर नहीं हैं।  हाँ , धर्म के साथ दरिद्र और दास की अवस्था  मिल जाय तो मुझे मंजूर है।  मतलब श्रावक के घर में नौकरी पर रहना मेरे को पसंदिता होगा।  लेकिन बिना जिनधर्म चक्रवर्ती जैसा उच्चतम पद मैं पसंद नहीं करता।
जैनधर्म का स्वरूप दिखाते हुए शास्त्रकार कहते है – जिस धर्म में स्याद्वाद हैं , किसी का पक्षपात नहीं हैं , किसी को पीड़ा देने की बात ही नहीं है, वह जैनधर्म कहलाता है।  विश्व की हरएक समस्याओं का समाधान स्याद्वाद से मिलता है।  गुणों के प्रति ही पक्षपात रखने वाला जैनधर्म है।  परपीड़ा देने से मना है।
मलिन आत्मा को सुवर्ण जैसा शुद्ध बनता है धर्म ! पाप कार्यों से  मलिन हुई आत्मा धर्म करती है।  पापका प्रायश्चित्त और पश्चाताप करती है, तो अवश्य शुद्ध होती है।  हाँ , प्रायश्चित्त और पश्चाताप का सही तरीका यह है कि – दुबारा पाप नहीं करने का संकल्प करें।

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