आस्तिकवाद व नास्तिकवाद शास्त्रार्थ चर्चा का विषय : आचार्य महाश्रमण

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AHINSA KRANTI NEWS

हैदराबाद। हजारों-हजारों किलोमीटर पदयात्रा कर जन मानस में अहिंसा, नैतिकता, सद्भावना व नशामुक्ति की अलख जगाने वाले शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज कल्पतरू सभागार में रायपसेणियं आगम की व्याख्या कर पावन प्रवचन प्रदान करते हुए कहा- राजा प्रदेशी और कुमारश्रमण केशी के बीच आस्तिकवाद – नास्तिकवाद पर चर्चा हो रही है। राजा प्रदेशी नास्तिकवाद का अनुयायी तो कुमारश्रमण केशी आस्तिकवाद के अनुयायी। राजा प्रदेशी बोला गुरुजी मेरी दादीजी जो थी वो बड़ी धार्मिक व श्रमणोपासिका थी। आपके सिद्धांत के अनुसार तो वो स्वर्ग में गई है। मेरी दादीजी अगर आकर कह दे कि बेटा मैने धर्म किया और मैं स्वर्ग में हूं तूम भी धर्म करो स्वर्ग में पैदा हो जाओगे, तब तो मैं आपकी बात मान लूंगा।

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केशी बोले ठीक है हमारे सिद्धांत के अनुसार तुम्हारी दादी स्वर्ग में गई है पर में एक बात तुमसे कहना चाहूंगा कि तुमने मानलों शरीर की शुद्धता कर ली और पात्र में जल व पूजा सामग्री लेकर मंदिर में पूजा के लिए जा रहे हो इतने में कोई व्यक्ति शौचालय से तुमको आकर बोले कि राजन् अाइए एक बार शौचालय में बैठिए तो क्या तुम बीच में शौचालय में जाओगे। राजा बोला बिल्कुल नहीं जाऊंगा मुनिवर। केशी बोले क्यों नहीं जाओगे। मुनिवर में मंदिर जा रहा हूं और बीच में ऐसे गंदे स्थान में क्यों जाऊंगा। केशी मुनि बोले  प्रदेशी इसी प्रकार तुम्हारी स्वर्गासीन दादी भी इच्छा होते हुए भी तुम्हारे पास चार कारणों से नहीं आ सकती।

पहला कारण है देव जब देवलोक में पैदा होते है तो वे वहां के काम भोगों में आसक्त हो जाते है। दूसरा कारण है वे वहां पैदा होने के बाद वहीं के प्रेम में रम जाते है।तीसरा कारण है वो सोचते है कि थोड़ी देर ठहर के चला जाऊ उतने में तो यहां की पीढ़ियां समाप्त हो जाती है। चौथा कारण है जो देव अभी देवलोक में पैदा हुआ है उसको मनुष्य लोक की दुर्गंध लगती है और वह मन में सोचने लगता है कि बदबू में कौन जाए। इसलिए आप हमारी बात को स्वीकार करो क्योंकि हमने आपकी बात का जवाब दे दिया है। प्रदेशी बोला अभी मेरी बात और है उससे मेरी बात सिद्ध हो सकती है। एक बार में अपनी  मंत्री परिषद में बैठा हुआ था उस समय कोतवाल एक चोर को पकड़ कर लाए। मैने उस चोर का जीना बेकार मानकर उसे लोहे कि कुम्भी में डालकर उस को सीलबंद करने का आदेश दे दिया और वहां पहरा लगा दिया।  कुछ समय बाद मैने उस कुम्भी को खुलवाकर देखा तो वो चोर तो मरा हुआ था लेकिन उस कुंभी में कोई छेद नहीं था। अगर आत्मा होती और वो वहां से निकलती तो जरूर कोई छेद उसमें होना चाहिए था। इसका मतलब आत्मा नाम कि कोई चीज नहीं है और मेरा सिद्धांत सही है।

केशी समझाते हुए बोले राजन् एक कोई छोटा सा सघन सा कमरा है उसमे कोई छेद नहीं है। एक आदमी उसमे भेरी और डंडा लेकर बैठा है और उन दोनों को बजा रहा है तो बताओ उसकी आवाज बाहर आ रही है या नहीं। राजा बोला हां मुनि जी सुनाई देती है। तो केशी ने कहा बताओ बिना किसी छेद के वो बाहर किस रास्ते से अाई। इसी प्रकार आत्मा की ऐसी प्रकृति है कि कहीं कोई छेद किए बिना वो पृथ्वी को, शीला को भेदकर भीतर से बाहर आ जाती है। प्रदेशी तुम अब स्वीकार करो आत्मा अलग है शरीर अलग है। राजा बोला गुरुजी एक बात और है उससे मेरी बात सिद्ध हो जाएगी। एक बार मैं बैठा था तो एक अपराधी को लाया गया मैने उसे मारने का आदेश दे दिया। मारने से पहले और मारने के बाद में उसका वजन किया गया। दोनों समय उसका वजन एक ही था। अगर आत्मा उसमे से निकली होती तो उसका वजन कुछ तो कम होना चाहिए था। इससे यह सिद्ध होता है कि आत्मा नाम की कोई चीज नहीं होती। मुनि बोले आत्मा का कोई वजन नही होता है। किसी डब्बी को हवा भरने से पहले और बाद में वजन करने से वजन में कोई फर्क नहीं पड़ता। हवा की तरह ही आत्मा का कोई वजन नहीं होता है।

आप मेरी बात पर विश्वास करो। मुनिवर आपकी बात तो सही है लेकिन अभी में नहीं मान सकता आपको और बात बताऊंगा। यह शास्त्रार्थ  उन दोनों के बीच चल रहा था। गुरुदेव तुलसी की भी इसी विषय पर बालचंद जी नाहटा से सरदारशहर में तीन दिन तक चर्चा चली थी। मेरे भी मन में कभी आता है कि में भी कभी किसी नास्तिक विचारधारा के सक्षम आदमी से चर्चा करूं। हैदराबाद में कोई ऐसा नास्तिकवाद का विद्वान व्यक्ति हो तो में विनम्र भाव से उससे इस विषय पर चर्चा करना चाहता हूं और उसकी बात का मेरी आस्तिक विचार धारा से खंडन भी करना चाहता हूं।
कार्यक्रम के तत्पश्चात श्रीमती बीना दस्सानी ने बालोदय किड जोन के बारे में जानकारी दी व बच्चों ने किड जोन न्यूज अबतक के माध्यम से अपनी प्रस्तुति दी। गुरुदेव ने फरमाया कि किड जोन के माध्यम से बच्चों में अच्छा ज्ञान भी बढ़े और उनमें अच्छे संस्कार भी आए। क्योंकि ज्ञान और संस्कार दोनों जीवन में होते है तो जीवन में सर्वांगीण विकास हो सकता है।

भौतिकता के आकर्षण की शक्ति बच्चों पर हावी न हो ऐसा प्रयास होना चाहिए। अणुव्रत बालोदय किडज़ोन के द्वारा बच्चों में अच्छे संस्कारों व अच्छे ज्ञान के निर्माण का प्रयास होता रहे तो अच्छा है।पुज्यवर के सानिध्य में टीपीएफ मेधावी सम्मान समारोह का आयोजन हुआ। गुरुदेव ने फरमाया कि मेधावी विद्यार्थियों में ज्ञान के विकास के साथ मर्यादा भी जीवन में रहे तो उनका जीवन अच्छा बन सकता है। टीपीएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नवीन पारख ने टीपीएफ की योजनाओं के बारे में विस्तृत जानकारी दी। इस अवसर पर टीपीएफ पर्यवेक्षक मुनि रजनीश कुमार जी ने वक्तव्य दिया। टीपीफ  के राष्ट्रीय सह कोषाध्यक्ष श्री नरेश कठोतिया ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

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