जैन समाचार

आर्यिका अजित नन्दनी माताजी का संलेखना धारण कर समाधिमरण हुआ

AHINSA KRANTI NEWS

जम्बू स्वामी तपोस्थली बोलखेड़ा पर दिगंबर जैन आचार्य वसुनंदी महाराज ससंघ के सानिध्य में बुधवार को चमेली देवी से जैन साध्वी आर्यिका अजीत नंदनी माताजी बनी जिनका यम संलेखना धारण कर समाधिमरण हुआ। अंतिम क्रियाएं तपोस्थली पर ही हुई सम्पन्न।तपोस्थली के प्रचार प्रभारी संजय जैन बड़जात्या ने बताया कि 16 दिवसीय संलेखना धारण कर 18 अगस्त रात्रि को आचार्य संघ के सानिध्य में समाधि पूर्वक देवलोकगमन हुआ जिनकी अंतिम क्रियाएं तपोस्थली पर ही पूर्ण की गई तो मुखाग्नि धर्मेश जैन ग्रहस्थ धर्म के पुत्र द्वारा दी गयी । इस अवसर पर आचार्य ने कहा कि जैन धर्म मे जब अंतिम समय में शरीर कृष होने लगता है अर्थात मृत्यु का समय नजदीक दिखलाई पड़ता है तब संलेखना धारण कर शने शने आहार का त्याग कर समाधि पूर्वक मृत्यु को वरण किया जाता है। 

जिसे अंतिम समय की उत्कृष्ट स्थिति कहा जाता है । उन्होंने कहा कि जैन धर्म मे मृत्यु को भी महोत्सव के रूप में मनाया जाता है।  धर्म की भावनाओ से ओतप्रोत साधु संघो के सानिध्य में जो समाधि होती है वह सर्वोच्च फल को देने वाली होती है। प्रत्येक जैन श्रावक श्राविका को यही भावना भानी चाहिए कि मेरा अंतिम मरण समाधि पूर्वक ही हो यही जीवन का सार है।*चमेली देवी से बनी आर्यिका अजितनन्दनी* विगत 3 अगस्त से संलेखनारत अजमेर केशरगंज निवासी 72 वर्षीय चमेली देवी धर्मपत्नी पदम चन्द जैन को आचार्य वसुनंदी महाराज ने दस अगस्त को क्षुल्लिका दीक्षा व पन्द्रह अगस्त को नारी जाति का सर्वोच्च पद आर्यिका दीक्षा प्रदान कर आर्यिका अजितनन्दनी माताजी नाम प्रदान किया। 16 दिन तक संलेखना धारण कर 18 अगस्त को रात्रि 11 बजे आचार्य संघ के सानिध्य में अंतिम स्वांस ली।

मुनि ज्ञानानंद महाराज ने बताया कि अंतिम स्वांस तक धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत रहते हुए उत्कृष्ट समाधि को प्राप्त किया।*बचपन से मिले धार्मिक संस्कार* संस्कार अंतिम समय मे नही मिलते अपितु वे बचपन से ही फलते फूलते रहते हैं यही चमेली देवी के साथ हुआ क्योकि उनका जन्म एक धार्मिक परिवार में हुआ जो मुरैना जिले के श्यामपुर गांव में निवास करता था। इनके ग्रहस्थ जीवन के पिता श्री झुन्नी लाल बढारी स्वयं एक बहुत बड़े जैन सन्त आचार्य अजित सागर महाराज बनें तो बचपन के संस्कारों ने हिलोरे मारे और उनको अंतिम समय मे लगभग 18 दिगम्बर जैन साधुओं व साध्वियों का सानिध्य प्राप्त हुआ।पुत्र धर्मेश जैन ने बताया कि भरापूरा परिवार जिसमे एक पुत्र और चार पुत्रियां रेणु,नीतू,सीतू,रितु है पौत्र ,पोत्रियो के अलावा नवासे नवासिया भी हैं चमेली देवी की भावना के अनुरूप ही उनको दीक्षा दिलवाई गयी और आचार्य संघ का सानिध्य प्राप्त हुआ जो हमारे पुण्य का कारण ही है।\

*अंतिम क्रिया पर कोरोना का साया* जैन धर्म मे जब भी किसी साधु या साध्वी का समाधिमरण होता है तो उसका समाचार प्राप्त होते ही हजारों श्रद्धालु अंतिम क्रिया में सम्मिलित होने को एकत्रित हो जाते हैं किंतु इस बार कोरोना महामारी का साया यहाँ भी नजर आया मात्र पन्द्रह बीस श्रद्धालुओं की उपस्थिति में सोशल डिस्टेंस,मास्क आदि का प्रयोग कर प्रसाशनिक गाइड लाइन के अनुरूप अंतिम क्रियाएं सम्पन्न करवाई गयी। तपोस्थली के कोषाध्यक्ष किशोर जैन के अनुसार जम्बूस्वामी तपोस्थली पर आचार्य वसुनंदी महाराज के सानिध्य में मुनि इक्छा नंद महाराज,आर्यिका सुविधिनन्दनी माताजी सहित छठी समाधि सम्पन्न हुई है। वास्तविक रूप से ये क्षेत्र संयम साधना, तप करने की उत्कृष्ट भूमि है।

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