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अध्यात्म की साधना का एक महत्वपूर्ण उपक्रम है -आश्रव को कमजोर करना : आचार्य श्री महाश्रमण

AHINSA KRANTI NEWS / RAJENDRA BOTHRA
हैदरबाद। 23 जुलाई। ठाणं आगम में कहा गया है कर्मवाद एक महत्वपूर्ण दार्शनिक विषय है, आत्मवाद से जुड़ा हुआ है, अगर आत्मवाद न हो तो कर्मवाद भी कैसे टिक सकता है, यह एक प्रश्न है। अध्यात्म की साधना की दृष्टि से यह आत्मवाद और कर्मवाद दोनों बड़े महत्वपूर्ण वाद है क्योंकि आत्मा है तो अध्यात्म की बात है, कर्म है और कर्मों से मुक्ति की बात है। तो अध्यात्मवाद  का एक महत्व होता है। कर्मवाद पर जैन शासन में, जैन वांग्मय में और ग्रंथों में भी प्रकाश डाला गया है। उस कर्मवाद की एक बात ठाणं के एक सूत्र में शास्त्रकार ने बताई है कि जीव पाप कर्म का जो ग्रहण करते हैं, किया भी है, करेंगे । पापकर्म, आठ पापकर्म जैन दर्शन में प्रसिद्ध है- ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, आयुष्य, नाम ,गोत्र, अंतराय, यह आठ कर्म है।
इन आठ कर्मों में पुण्य कितने कर्म है और पाप के रूप में कितने कर्म है ।ज्यादा तो पाप के कर्म ही हैं, चार कर्म तो एकांत पाप है, ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय ,अन्तराय और यही वे चार कर्म है जिनको घाती कर्म कहा जाता है, चार तो पाप के पूरे हो ही गए ,पीछे बचे चार, उन चारों में भी वेदनीय ,आयुष्य ,नाम, गोत्र यह पुण्यात्मक भी होते हैं तो साथ में चारों के चारों पापात्मक भी होते हैं, तो इन चारों में तो दोनों की भागीदारी है, पुण्य की भी है, पाप की भी है, तो आठों कर्मों में एक दृष्टि से देखें तो पाप कर्म का पलड़ा भारी है। शास्त्रकार ने यहां पाप कर्म की ही बात की है कि जीव पाप कर्म ग्रहण करते हैं।
पाप कर्म का ग्रहण क्यों होता है, आश्रव है तो पाप कर्म का ग्रहण होता है। नौ तत्वों में जीव के अलावा आश्रव तत्त्व, पाप कर्म को व पुण्य कर्म को ग्रहण करने का जिम्मेदार है, यानी आश्रव कर्मों का कर्ता है, बाकी के सात तत्व अजीव, पुण्य, पाप, संवर, निर्जरा, बंध, मोक्ष, कर्मों के कर्ता नहीं होते हैं, ये कर्मों को ग्रहण नहीं करते हैं। आश्रव पांच हैं ,चार आश्रव जो ये हैं, मिथ्यात्व, अवृत, प्रमाद, कषाय, इन चारों से पाप कर्म का ही ग्रहण होता है पुण्य का नहीं, अब जो योग आश्रव है उसके दो भेद हैं, शुभ योग, अशुभ योग। शुभ योग से पुण्य का बंध होता है, अशुभ योग से पाप का ही बंध होता है, इसका मतलब है जीव पाप कर्म कितना ग्रहण करता है। पाप करता है तभी तो संसार में जन्म मरण हो रहा है ,अगर पाप का ग्रहण न हो, बंद हो जाए तो बाद में कब तक आत्मा संसार में भ्रमण करेगी। तो यह आश्रव नामक तत्व है, वह हमारी आत्मा को मलिन बनाने वाला है। हमारा हीरो से जड़ित, रत्नों से जड़ित आंगन ,कौन सा आंगन? चेतना का आंगन, आत्मा का आंगन, वह हीरो से जड़ित, रत्नों से जड़ित कैसे हुआ?
हमारी चेतना में केवलज्ञान, केवलदर्शन जैसे हीरे हैं, हमारी चेतना में अनंत आनंद रूपी, अनंत शक्ति रूपी रत्न है, तो कितना हीरों- रत्नों से जड़ा हुआ हमारा यह आत्मा का आंगन है, इस आंगन को मलिन करने का जिम्मेदार एकमात्र आश्रव है।तो यह कर्मों का ग्रहण होता है वह आश्रव करता है, अब किन पुद्गलों को लेता है यह बात शास्त्रकार ने यहां ठाणं में बताई है कि जीवों ने छह स्थान निर्वर्तित पुद्गलों को पाप कर्म के रूप में ग्रहण किया था, करते हैं करेंगे, यह एक सिद्धांत की बात है। तो कर्मवाद के संदर्भ की बात है कि कौन से पुद्गलों को ग्रहण किया जाता है यह एक सृष्टि के नियम की बात शास्त्रकार ने बताई है।
अब हमें यह ध्यान देना चाहिए कि जो यह आश्रव है वह कर्मों को ग्रहण करता है, वह पाप कर्मों को भी ग्रहण करता है, उन पाप कर्मों के ग्रहण को कितना रोका जा सके, कितना बंद किया जा सके, उस पर हमें ध्यान देना चाहिए। कैसे ध्यान दें, कि मिथ्यात्व आश्रव है, हमारा दृष्टिकोण सम्यक हो जाए, सम्यकत्व की प्राप्ति हो जाए, अगर क्षायिक सम्यकत्व किसी को आ जाए फिर तो मिथ्यात्व आश्रव बिल्कुल खत्म हो जाएगा, कोई पाप कर्म नहीं, मानो उसकी हमेशा के लिए मृत्यु हो जाएगी। अवृत आश्रव को भी रोकने पर हम ध्यान देवें, अशुभ योग आश्रव को रोकने का प्रयास करें। गृहस्थ भी अशुभ योग आश्रव का अल्पीकरण तो कर ही सकता है कि अशुभ योग मेरे कम हो। मन में, वाणी में, काय में अशुभता न रहे, जितना बचाव हो सके करें। क्या होगा, यह आश्रव कमजोर पड़ जाएगा। अध्यात्म की साधना का एक महत्वपूर्ण उपक्रम है आश्रव को कमजोर करना और संवरा व निर्जरा को पुष्ट करना ।इससे हमारा हीरो से, रत्नों से जड़ा जो चेतना का प्रांगण है उसकी सफाई हो सकेगी।

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