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जैनों के पर्युषण यानी तप-जप-दान-दया-त्याग का पर्व – आचार्य श्री भव्यदर्शन सूरीश्वर

AHINSA KRANTI NEWS

ब्यूरो चीफ – दलीचंद श्रीश्रीमाल


मैसूर । श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर तथा साध्वी भद्रिकाश्रीजी म. ने धर्म संदेश मे बताया कि – जैनों के पर्युषण यानी तप-जप-दान-दया-त्याग-प्रतिक्रमण-प्रवचन-जिनभक्ति-गुरुभक्ति-ज्ञानभक्ति-बहुमान-क्षमा की लेन-देन के बड़े व्यापार की मौसम ! इन दिनों में कंजूस भी उदार बन जाता है । भोगी भी त्यागी बन जाता है । खाऊ या पेटू भी तप में जूट़ जाता है । पापी पुण्यशाली बन जाता है । निर्दय दयालु हो जाता है ।

क्रोधी शांत हो जाता है । रोजाना धर्म नहीं करने वाले धर्म करने लगते है ।पर्वाधिराज के दूसरे दिन 11 कर्तव्य का प्रवचन होता है, जो साल में कम से कम एक बार तो अवश्य करना है । 1.संघपूजा : साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविका रूप चतुर्विध संघ की सुयोग्य द्रव्यादि से, दिल के भावों के साथ भक्ति । खुद तीर्थंकर भगवान भी इन संघ को नमो तित्थस्स कहकर नमन करते है । वस्तुपाल-तेजपाल-कुमारपाल राजा-आभूशेठ आदि के नाम इस विषय में इतिहास रचा गया है । 2.साधर्मिकभक्ति : धनवान या निर्धन का भेद न गिनते हुए धर्मभावना से उदार बनकर सन्मान के साथ साधर्मिक की यथाशक्ति भक्ति करना । एक ओर तराजु में सब धर्म रखें दूसरे पलड़े में साधर्मिक भक्ति रखें तो साधर्मिकभक्ति वाला पलड़ा झूकेगा । 3.यात्रात्रिक : अष्टान्हिका महोत्सव, तीर्थयात्रा और रथयात्राः तीनों का समावेश इसमें होता है । हरसाल तीर्थयात्रा-रथयात्रा और अट्ठाई महोत्सव करना चाहिए । न बन सकें तो सामुदायिक रूप से कार्य करना चाहिए ।

4. स्नात्रपूजा : भक्ति के लिए सब से बड़ा और ऊँचा पात्र है जिनेश्वर भगवान । उनकी स्नात्र यानी जन्मकल्याणक की झांकी । कुमारपाल राजा रोज 1800 करोडपति को साथ में लेकर स्नात्र पढ़ाते थे । 5.देवद्रव्य की वृद्धि : स्वद्रव्य आदि से होती देवद्रव्य की आय के कारण ही आज इतने जिनालय झकाझक और जाज्वल्यमान दिखते है । रोज हुंडी-दानपेटी-भंडार में पैसे ड़़ालकर भी इस कर्तव्य का पालन करना चाहिए । 6.महापूजा : साल में एक बार तो प्रभु की अंगरचना से लेकर जिनालय का शृंगार रूप महापूजा करनी चाहिए ।

7.रात्रिजागरण : प्रभु के कल्याणके या गुरू के निर्वाण के दिनों में इस कर्तव्य का पालन करना । 8.श्रुतपूजा : केवलज्ञान की कूंजी के रूप में है श्रुतज्ञान रोज सुवर्ण-रौप्य मुद्रा या रूपये वगैरह रखकर श्रुत की वासक्षेप-धूप-दीप आदि से पूजा करें ।  कम से कम साल में एक बार तो अवश्य करें । 9.उद्यापन : हरएक तप के पूछे, तप का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए उजमणा करना चाहिए । 10.तीर्थ प्रभावना : तीर्थ यानी शासन-शासनकी प्रभावना के लिए गुरू भगवंत का नगर प्रवेश-विशिष्ट दानादि के जरिये इस कर्तव्य का पालन करें । 11.शुद्धि : पाप लेकर परलोक में जानेवाली आत्मा दुर्गति में जाती है, पाप को मारकर मरना है, ताकी सद्गति हो । रोज के रोज पापों की आलोचना और प्रायश्चित करके आत्मा की शुद्धि कर लें । आखिर साल में एक बार तो जरुर करें । इस सब कर्तव्यों का पालन रोज, शक्ति-संयोग न हो तो महिने में अवश्य करें ।

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