जैन समाचार

आचार्य श्री भव्यदर्शन सूरीश्वर म.सा ने अपने मुखारविंद से किया भगवान महावीर जन्म वांचन

मैसूर। श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर तथा साध्वी भद्रिकाश्रीजी म. ने धर्म संदेश मे बताया कि – अनादिकाल से आत्मा संसार में भटक रही है । संसार के अंत के लिए धर्म ही साधन है । मुक्ति की प्राप्ति के लिए योग ज़रूरी है । योग के असंख्य प्रकार है । ज्ञान – ध्यान – क्रिया – तप – यात्रा – भक्ति – शास्त्रश्रवण – स्वाध्याय – कायोत्सर्ग – सामायिक – प्रतिक्रमण – दान आदि योग है । जो मोक्ष के साथ आत्मा को जोड़ता है, वह योग है ।कल्पसूत्र का श्रवण भी एक योग है । पर्युषण में जैनों की हर ज़गह भीड़ नज़र आती है ।

उसमें भी वीर जन्म वांचन और संवत्सरी के दिन सबसे ज्यादा भीड़ रहती है । कोरोना के कारण इस साल सब फिका लग रहा है । वीरप्रभु चरित्र पठन के दौरान आज जन्म का वांचन होता है । 14 स्वप्न उतारने की क्रिया होती है । हर एक जैन को छोटे से बड़े तक सब के दिल में आनंद की लहर होती है ।श्वेताम्बर जैनों के लिए आजका दिवस धन के ममत्व के त्याग का है । संवत्सरी का दिन कषायों के त्याग का है । कंजूस भी आज उदार बन जाता है । आज के दो प्रवचन में 5 से 14 स्वप्न का वर्णन, रोमांचक – प्रासादिक शैली में किया है । आकाश से उतरते हुए और त्रिशला माता के मुँह में प्रवेश करते हुए स्वप्न माताजी देखनें है । पांचवा स्वप्न फुलों की माला का है । छट्ठा स्वप्न सोलह कलाओं से परिपूर्ण चन्द्र का है । सातवें स्वप्न में त्रिशलाजी अंधकार का नाश करने वाला सूर्य को देखती है । उसके बाद क्रमशः बड़ा ध्वज – मंगलकारी कुंभ (कलश) – पद्मसरोवर – क्षीर सागर – देवविमान – सोलह प्रकार के रत्नों का समूहरूप रत्नराशि और बिना धुआँ वाला अग्नि । ये चौदह स्वप्न हरएक तीर्थंकर की माता को तीर्थंकर के गर्भ में आते ही दिखते है ।परमात्मा का माता की कुक्षि में आगमन होते ही सिद्धार्थराजा का भवन धन-धान्य-राज्य-राष्ट्र-रत्न-सुवर्ण-रजत-प्रजा-संपत्ति-खिताब आदि सारभूत सामग्री से अति बढ़ने लगा ।

इसी ही कारण इस बालक का नाम ‘वर्धमान’ रखने का संपल्प माता-पिता ने कर लिया । त्रिशला माता अपने गर्भ की सुरक्षा के लिए और जीव को कष्ट-पीड़ा न हो ऐसी भावना से ऋतु-प्रकृति के अनुरूप आहार-पाणी-हलन-चलन-बेढना-उठना वगैरह का पालन करते है । गर्भ के प्रभाव से माता को अमारि पड़ह बजाना, निर्दोष उद्यानक्रीड़ा करना आदि शुभ-प्रशस्त दोहद उत्पन्न होते है । उन सब को सिद्धार्थ राजा पूरे करते है . आषाढ़ सुद.6 के दिन च्यवन हुआ था प्रभु का नौ महिना और साढ़े सात दिन के बाद चैत्र सुद 13 के दिन पीड़ा रहित त्रिशला माता पुत्र को जन्म देती है । प्रभु के जन्म की कुशाली में जैनों श्रीफल – नारियल फोड़ते है । जय जयकार के सूरों के वातावरण को भर देते है । दिल को पवित्र  भावों से भर देते है । पालणा में भगवान को पधराकर झुलाते है । पालणा घर पर ले जाते है ।

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