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पुण्य से भी बड़ी चीज है शुद्ध आत्मा को पा लेना : आचार्य महाश्रमण

AHINSA KRANTI NEWS

हैदराबाद। तीर्थंकर के प्रतिनिधि, तेरापंथ धर्मसंघ की पुण्यशाली आचार्य परंपरा के ग्याहरवें पटधर, राष्ट्रसंत, परमपूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी ने आज अपने मंगल प्रवचन में फरमाया कि हमारी सृष्टि में मनुष्य लोक है, पशु जगत भी है, नरकलोक भी है, तो देवलोक भी है, स्वर्गलोक भी है। सबकी अपनी – अपनी व्यवस्थाएं होती है।

नरकलोक व देवलोक दोनों एक दूसरे के प्रतिपक्षी होते हैं। दोनों में बड़ा अंतर है, एक मानो पापियों के मरकर जाने का व दूसरा धार्मिकों के मरकर जाने का स्थान है। हमारी सृष्टि में जो संसारी जीव है वे पुलिंग भी होते हैं, उनमें स्त्रीलिंग भी होते हैं, नपुंसक भी होते हैं। नरक व देवलोक में एक बड़ा अंतर यह है कि नरक में उत्पन्न होने वाले सभी प्राणी नपुंसक ही होते हैं यानि न पुरुष होते हैं और न स्त्रियाँ होती हैं। जबकि देवलोक में कोई नपुंसक नहीं होता, या तो देव होते हैं या फिर देवियाँ होती हैं। यह सृष्टि का मानों एक नियम है। ठाणं आगम के सातवें स्थान में तीन बातें उल्लेखित हैं। पहली बात – पहले देवलोक के मुखिया शक्र के सात अग्र महिशियाँ होती हैं। दूसरी बात – दूसरे देवलोक के लोकपाल महाराज सोम के सात अग्र महिशियाँ होती हैं। तीसरी बात – तीसरे देवलोक के लोकपाल महाराज ईशान के सात अग्र महिशियाँ होती हैं। यह देव जगत की बात है। देवों की पहचान भी बताई गई है।

देवता सदा अनिमेष रहते है, कभी पलक नहीं झपकते। उनके पैर धरती पर नहीं टिकते बल्कि हमेशा धरती से चार अंगुल ऊपर ही रहते है। शरीर बड़ा कांतिवाला होता है। देव जगत में पैदा होना एक पुण्य का फल हो सकता है। पुण्य से भी बड़ी चीज है शुद्ध आत्मा को पा लेना। पुण्य तो कर्म है इससे सुख मिल सकता है। जब तक पुण्य कर्म नहीं छूटते है तब तक मुक्ति नहीं मिल सकती। आदमी को स्वर्ग में जाने की इच्छा भी रह सकती है परंतु स्वर्ग भी परम नहीं है। भगवान महावीर के समय का रोहीणेय चोर का सुप्रसिद्ध प्रकरण सर्व विदित है। पिता के निर्देशानुसार उसे भगवान महावीर की वाणी नहीं सुननी थी व उनके संपर्क में भी नहीं आना था, लेकिन एक बार पैर में काँटा चुभने के कारण भगवान महावीर द्वारा सुनाई जा रही देवताओं से सम्बन्धित जानकारी के कुछ शब्द उसके कानों में पड़े, उन शब्दों के ज्ञान ने उसे बचा लिया।

अब रोहीणेय चोर ने सोचा भगवान महावीर की थोड़ी – सी वाणी ने मेरा कल्याण कर दिया, मेरा बचाव कर दिया, वरना आज में पकड़ा जाता। अब उसके मन में आया अगर में ध्यान से सलक्ष्य भगवान की वाणी सुनुंगा तो मेरा कितना उद्धार हो जाएगा। उसके बाद उसने महावीर की शरण ग्रहण कर ली।  


आचार्यवर ने आगे प्रेरणा देते हुए फरमाया कि अर्हतों की कल्याणी वाणी कानों में पड़ने से कितनों का कल्याण हो सकता है। हमें ध्यान यह देना है कि हम अपने गुरुओं के माध्यम से अर्हतों की वाणी का श्रवण करें व उसका धार्मिकता के रूप में अनुसरण करें। इससे संसार के सारे दु:खों से बचाव की स्थिति मिल सकती है। ये जो निर्ग्रंथ प्रवचन व वीतरागता का मार्ग है वो सब दु:खों से मुक्ति का मार्ग हैं। इससे सर्व दु:ख मुक्ति का स्थान , मोक्ष का स्थान प्राप्त हो सकता है। हम आत्म कल्याण की दिशा में अग्रसर होते हुए अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करें, यह काम्य है।

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