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जैन शासन में तीर्थंकर भगवान का परम महत्व : आचार्य महाश्रमण

AHINSA KRANTI NEWS

हैदराबाद। तीर्थंकर प्रभु महावीर के प्रतिनिधि, तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी ने महाश्रमण वाटिका के कल्पतरु भवन में मंगल उद्बोधन देते हुए फरमाया कि ठाणं आगम में बताया गया है जैन शासन में तीर्थंकर भगवान का परम महत्व है। सिद्ध तो हमारे सामने होते नहीं है, सामने जो होते है उनमें सबसे बड़े तीर्थंकर होते है। पूरे जैन शासन में उनसे बड़ा कोई नहीं है। पूरी मानव जाति में , प्राणी जगत में, सारे संसारी जीवों में आध्यात्म की दृष्टि से, प्रवचनकार व ज्ञानदाता की दृष्टि से तीर्थंकर से बड़ा दूसरा और कोई नहीं होता। उनके बाद गणधर का महत्व होता है, वे भी नहीं तो आचार्य व उपाध्याय का बड़ा महत्व होता है। आचार्य का एक मुख्य काम है सूत्र के अर्थ की वाचना देना और उपाध्याय का कार्य है सूत्र की वाचना देना। दोनों ही ज्ञान दान से जुड़े हुए है।

उपाध्याय का ज्ञान की दृष्टि से व आचार्य का संघ संचालन की दृष्टि से बड़ा महत्वपूर्ण स्थान होता है। कहीं – कहीं दोनों दो व्यक्ति व कहीं – कहीं दोनों एक ही व्यक्ति होते है। हमारे धर्मसंघ में आचार्य ही दोनों कार्य संपादित कर रहे हैं। हमारे धर्मसंघ के इतिहास में आज तक विधिवत कोई भी उपाध्याय नहीं हुआ है। आचार्य व उपाध्याय से लिए सात विशेष विधियां व बातों का उल्लेख ठाणं आगम में किया गया है – १. आचार्य अपने पैरों की धूलि को बाहर न झाड़कर अंदर आकर भी झाड़ सकते है। २.आचार्य  उपाश्रय के अंदर ही शौच, प्रस्रवण आदि करें तो कोई बाधा नहीं है, आज्ञा का अतिक्रमण नहीं है। ३. रुग्न व बीमार साधु-साध्वियों की सेवा आचार्य करें या ना करे यह उनकी इच्छा है, उनके लिए बाध्य नहीं है क्योंकि आचार्य के पास दूसरे विशेष कार्य भी होते हैं। ४. आचार्य को उचित लगे तो वे उपाश्रय में १-२ दिन एकांतवास भी कर सकते है। ५. आचार्य उपाश्रय से बाहर भी १-२ दिन के लिए एकांत साधना कर सकते हैं। ६. आचार्य के उपकरण व वस्त्र कुछ विशेषता वाले हों। उपकरण व वस्त्र साफ-सुथरे रहें, उनमें मैलापन न हो।

७. उनका भक्त-पान अर्थात भोजन व पानी स्वास्थ्य के अनुकूल हो, स्निग्ध हो, मृदु हो, रूखा सूखा भोजन ना हो ताकि उनका स्वास्थ्य स्वस्थ रह सके। उनके लिए जो विश्वस्त हो, अच्छा हो, स्वास्थ्य के अनुकूल हो, ऐसा भोजन और पानी लाना चाहिए। ये सात बातें एक विशेष व्यक्ति के संदर्भ में आगम में विशेषतया बताई गई है। पूज्य प्रवर ने शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में प्रेरणा देते हुए फरमाया कि आज शिक्षक दिवस है। आचार्य व उपाध्याय दोनों ही शिक्षक होते है। हमारे शिक्षक विद्यार्थियों को पुस्तकीय ज्ञान के आलावा अच्छे संस्कार व अच्छा जीवन जीने की प्रेरणा भी दें। शिक्षक यह सोचे कि मेरे जो विद्यार्थी है ये ना केवल ज्ञान में योग्य बने अपितु संस्कारों व आचार की दृष्टि से भी योग्य बनें। इनमें संयम का संस्कार हो, नशामुक्त जीवन हो, अहिंसा व मैत्री की भावना हो, ईमानदारी हो। शिक्षक ज्ञान दाता होते है। शिक्षक अच्छे संस्कार देने वाले बनें, यह काम्य है।

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