जैन आयोजन

*ज्ञानार्जन- जीवन का महत्वपूर्ण उपक्रम* : आचार्य महाश्रमण

तेरापंथ के आचार्य महाश्रमण जी अभी अपनी धवल सेना के साथ सोलापुर ( महाराष्ट्र) के निकट स्तिथ ब्रह्मदेव माने इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के विशाल परिसर में विराज रहे है।परम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी द्वारा प्रदत आज 09 मार्च के प्रवचन में फरमाया की ज्ञान प्राप्ति हमारे जीवन का एक महत्वपूर्व उपक्रम है | धर्म के क्षेत्र में ज्ञान का क्रम सदा  चलता है, नमस्कार महामंत्र में हैं – उपाध्याय  उनको हमारा नमस्कार | वे  आध्यात्मिक शिक्षक होते हैं | वे पहले स्वयं ज्ञान को प्राप्त करते हैं तत्पश्चात दूसरों को  ज्ञान प्रदान करते है | दूसरों को पढ़ाने के लिए स्वयं के ज्ञान का विकास ज़रूरी होता है |

सफल विधार्थी ही तो सफल शिक्षक बन सकता है| ज्ञान प्राप्ति में पांच बाधाओं का उल्लेख मिलता है | पहली बाधा है – अहंकार ! ज्ञानार्थी ज्ञान और ज्ञान दाता दोनों के प्रति विनम्र रहे व गुरु को गुरु माने| एक नाले से पानी तभी आ सकता है जब नाला बंद न हो| उसी प्रकार ज्ञान की प्राप्ति के लिए अहंकार के अवरोध को हटाना होगा | ज्ञान की दूसरी बाधा है – गुस्सा, आक्रोश ! अध्ययन में मन शांत और झगड़ों से मुक्त रहे | ज्ञान की तीसरी बाधा है –  प्रमाद, मन न लगना ! चौथी बाधा है– रोग ! रोगों से घिरा रहने वाला ज्ञानार्जन नहीं कर पाएगा | ज्ञान प्राप्ति की पांचवी बाधा है – आलस्य व उत्साह की कमी ! आलस्य के सामान कोई शत्रु नहीं व श्रम और पुरुषार्थ के समान कोई दूसरा सखा नहीं | सफलता के लिए श्रमशीलता व जोश ज़रूरी है | स्वाध्याय भी एक ज्ञान का माध्यम है | अविनीत को विपत्ति और विनीत को संपत्ति मिलती है,  जिसको यह ज्ञात है वह शिक्षा प्राप्त कर सकता है| बारह तप में स्वाध्याय के समान कोई तप नहीं | स्वाध्याय, आलोक प्रदान करने वाली प्रवृत्ति है|पुरुषार्थ से ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए | ज्ञान के प्रति यदि समर्पण  भाव है तो पुरुषार्थ अच्छा होगा| ज्ञान के साथ हमारे संस्कार भी अच्छे बनेंगे । 

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