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हमारा मोहनिय कर्म क्षीण हो :आचार्य महाश्रमण

AHINSA KRANTI NEWS

हैदराबाद। शमशाबाद में चातुर्मास रत शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी ने कल्पतरु भवन में श्रद्धालुओं को ठाणं प्रवचनमाला के अन्तर्गत मोहनिय कर्म के बारे में व्याख्या करते  हुए कहा कि वीतराग एक बड़ा आध्यात्म से परिपूर्ण शब्द है। जिसके राग नहीं वह वीतराग होता है। वीतराग दो प्रकार का होता है। एक उपशांत मोह  वीतराग व  दूसरा क्षीण मोह  वीतराग। आठवें गुणस्थान के बाद दो रास्ते अलग – अलग हो जाते है, एक रास्ता उपशम श्रेणी का व दूसरा रास्ता क्षपक श्रेणी का है।  जो उपशम श्रेणी का रास्ता लेता है वो मोहकर्म को दबाता हुआ चलता है, नष्ट नहीं करता। दबाई हुई चीज तो वापिस आ सकती है। चलते चलते वह दसवें गुणस्थान को पार करके ग्यारहवें गुणस्थान में तो जाता ही है, यहां तक उसने मोह को संपूर्णतया दबा दिया, क्षीण नहीं किया है। वह दबाने वाला वीतराग बन गया। यह उपशांत मोह वीतराग कहलाता है।

यहां से आगे का मार्ग अवरूद्ध हो जाता है और फिर उसी मार्ग से वापिस लौटना पड़ता है। जिसने आठवें गुणस्थान से दूसरा रास्ता, क्षपक श्रेणी वाला लिया है वो साधु मोह को दबाता नहीं है क्षीण कर देता है। वह दसवें गुणस्थान से सीधा बाहरवें गुणस्थान में जाएगा, ग्यारहवें गुणस्थान में जाएगा ही नहीं। ज्योही बाहरवां गुणस्थान आया संपूर्णतया मोह कर्म क्षीण हो गया। यह बाहरवें गुणस्थान वाला साधु क्षीण मोह वीतराग कहलाता है। हम दूसरे रास्ते की ही भावना रखें। इसको यूं भी समझा जा सकता है कि एक तो कूड़े के ऊपर दरी डालकर दबा देना और दूसरा उसे निकालकर बाहर कर देना। वीतराग के मूल दो भेद है 

– छद्मस्थ वीतराग व केेवली वीतराग। अभी जो दो भेद बताए है वे छद्मस्थ वीतराग के दो भेद है यानि उपशांत मोह छद्मस्थ वीतराग व क्षीण मोह छद्मस्थ वीतराग। पूज्य प्रवर ने आगे तत्व का विश्लेषण करते हुए फरमाया कि वीतराग तेरहवें चौदहवें गुणस्थान में भी होता है। वहां वह केवली हो चुका होता है। केवली वीतराग के भी दो भेद है – एक सयोगी केवली जो १३ वें गुणस्थान में होता है और दूसरा अयोगी केवली जो १४ वें गुणस्थान में होता है। 14 गुणस्थानों में 4 गुणस्थान वीतराग में पाए जाते है व वीतराग भी चार प्रकार के होते हैं। वीतराग का पांचवां भेद सिद्धावस्था के आधार पर किया जा सकता है। इस प्रकार वीतराग के 5 भेद हो जाते है। कभी हम साधुओं को श्रेणी लेनी हो, हमें श्रेणी के चुनाव का मौका मिले तो उपशम श्रेणी न लेकर सीधे क्षपक श्रेणी लेनी चाहिए ताकि हमारा रास्ता सीधा रहे व केवल ज्ञान की तरफ आगे बढ़े। अाठ कर्मो में सात कर्मो का वेदन होता है एक मोहनिय कर्म का वेदन नहीं होता है।

मोहनिय कर्म सब कर्मों का राजा है इसके क्षीण हुए बिना सिद्धत्व की प्राप्ति नहीं हो सकती। हम मूल को पकड़ें। केवल्य व केवल-ज्ञान से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है – मोहनीय कर्म को क्षीण करना। हमारे कषाय व मोह क्षीण हो जायेंगे तो केवल-ज्ञान की प्राप्ति तो स्वतः ही हो जायेगी। हमें वीतरागता पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। ग्रहस्थ लोग है वे भी प्रयास यह करे कि हमारा मोहनिय कर्म कमजोर पड़े व वीतरागता का विकास हो।   *बाल मुनि ने की 8 दिन की तपस्या* महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य 12 वर्षीय मुनि खुश कुमार जी (चेन्नई) ने आज कार्यक्रम में अठाई  तप का प्रत्याख्यान किया। गुरुदेव ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि कई बार बड़े-बड़े जो काम नहीं कर पाते छोटे कर देते है। अठाई करना बड़ी बात है। अवस्था में छोटे हो सकते हैं पर तपस्या में बड़े हैं। तपस्या सलक्ष्य सविधि हो, कर्म निर्जरा का लक्ष्य रहे यह अच्छी बात है।

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