जैन प्रवचन jain pravchanजैन समाचार

धर्म के लिए पुरुषार्थ हो: आचार्य महाश्रमण

AHINSA KRANTI NEWS

हैदराबाद। शमशाबाद की महाश्रमण वाटिका में चतुर्मास रत, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, परम श्रद्धेय आचार्य महाश्रमण जी ने ठाणं प्रवचन माला के अन्तर्गत बताया कि ठाणं आगम में शास्त्र कार ने दो काल चक्रों के बारे में चर्चा की है ,एक दुषमा काल व दूसरा सुषमा काल। दोनों ही काल चक्रों के साथ सुख के बाहुल्य व दुःख के बाहुल्य की स्थितयां जुडी हुई है पर अंतर इतना है की अवसर्पिणी काल में क्रमिक ह्रास व उत्सर्पिणी काल में क्रमिक विकास की स्थितियां होती हो । अवसर्पिणी काल में अर की अवधि, मनुष्य की आयु व लम्बाई क्रमशः घटती जाती है जबकि उत्सर्पिणी काल में इन सबका क्रमशः विकास होता जाता है ।

दुःख और सुख दोनों इन दोनों काल चक्र में रहते हैं ।  इनको दुषमा व सुषमा के रूप में भी देख सकते हैं । दुषमा आरे के सात हेतु होते हैं,जिससे इसे जाना जा सकता है ।  १. अकाल वर्षा २. समय पर वर्षा न होना ३. असाधुओं की पूजा ४. साधुओं की पूजा न होना ५. गुरुजनों के प्रति मिथ्या व अविनय पूर्ण व्यवहार करना ६. मानसिक दुःख की वृद्धि ७. वचन के दुःख की वृद्धि । उत्सर्पिणी काल में ठीक इसके विपरीत स्थितियां घटित होती हैं । 1.अकाल में वर्षा नहीं होती 2.समय पर वर्षा होना  3. असाधुओ की पूजा नहीं होती 4. साधुओं की पूजा होती है 5.गुरुजनों का सम्मान होता है 6.मन संबंधी सुख मिलता है 7.वचन संबंधी सुख होता है ।

पहली दो बातें प्रकृति से व बाद की पांच बातें आदमी से सम्बन्धित होती है ।  काल का अपना क्रम है परन्तु आदमी को यह प्रयास करना चाहिए कि जितना अच्छा कर सके करे। आचार्य प्रवर ने आगे फरमाया कि आज के समय में कोई तीर्थंकर तो नहीं है, सातवें गुण स्थान से ऊपर के साधु भी नहीं है,अनेक धार्मिक मत-मतांतर भी चल रहें हैं, केवल-ज्ञान भी नहीं है पर इन सबसे निराश होने की कोई जरूरत नहीं । आज भी आगम जैसे ग्रंथ है, पंथ भी प्राप्त है और संत भी  प्राप्त है । इतना सब  मिला है इनसे हम अपना कल्याण कर सकते है। इस पांचवें अर में हम सौभाग्यशाली है जो हमें जैन शासन मिला, जिसमें भी हमें तेरापंथ  शासन मिला है उसका पूरा पूरा लाभ उठाते हुए हम आत्म कल्याण की दिशा में अग्रसर होते रहें, धर्म के लिए पुरुषार्थ करें, यह काम्य है। 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Close