जैन गुरु

आचार्य श्री ज्ञानसागर महाराज के जवाब परिचय पर एक नजर


अहिंसा क्रांति / अमित जैन बारां

 मुरैना में 1 मई 1957 को इन महान तपस्वी का उदय उमेश के रूप में हुआ । मात्र 17 बर्ष की आयु में ब्रम्हचर्यं व्रत और 19 वर्ष की आयु में ग्यारह प्रतिमा व्रत को धारण कर 12 वर्षो तक अपने जीवन को तप की अग्नि में तपाकर कुंदन बनाया । पूज्य पिता श्री शांतिलाल जी एवं माताश्री अशर्फी देवी जो की प्रथम संतान उमेश जी ने 5 नवम्बर 1976 को सिद्धक्षेत्र सोनरगीर में क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की एवं अपने गुरू समाधिसम्राट आचार्य 108 श्री सुमतिसागर जी के चरणो में स्वयं को सदा सदा के लिए समर्पित कर दिया।

उमेश से रूपांतरित हुए क्षुल्लक गुणसागर जी ने कई वर्षो तक न्याय व्याकरण एवं सिद्धान्त के अनेक ग्रंथो का चिंतन मनन एवं अध्ययन किया । तपश्चरण की कठिन और बहुआयामी साधना अपनी पूर्ण तेजस्विता के साथ अग्रसर रही। महावीर जयंती के पावन प्रसंग पर 31 मार्च 1988 को क्षु. श्री ने आचार्य १०८ श्री सुमतिसागर जी महाराज सें सिध्दक्षेत्र सोनागिर दतिया म. प्र. में निग्रंन्थ मुनि दीक्षा ग्रहण की और तब  मुनि ज्ञानसागर के रूप में युग ने पहचाना । अल्प समय पश्च्यात ही 3० जनवरी 1989 को सरधना जिला-मेरठ उ.प्र. में आचार्य १०८ श्री सुमतिसागर जी ने पूज्य श्री ज्ञानसागर महाराज जी को उपाध्याय पद से सुशोभित किया।


परम पूज्य आचार्य १०८ श्री ज्ञानसागर जी वर्तमान युग के एक ऐसे युवा दृष्टा क्रांतिकारी विचारधारा के जीवंत दिगम्बर संत है, जिनके जनकल्याणी विचार जीवन की अनन्त गहराइयों, अनुभूतियों एवं साधना की अनंत ऊंचाइयों सें उदभूत हो। पूज्य गुरुदेव के उपदेश हमेशा जीवन समस्याओं की गहनतम और जीवन के मर्म का संस्पर्श करते है। जीवन को उसकी समग्रता में जानने और समझने की कलाओं से परिचित कराते है । उनकें साधनामयी तेजस्वी जीवन को शब्दो की परिधि में बांधना संभव नही है । परम पूज्य आचार्य श्री के संदेश युगो युगो तक सम्पूर्ण मानवता का मार्गदर्शन करें, हमें अंधकार से दूर प्रकाश के बीच जाने का मार्ग बताते रहे।  आचार्य श्री की प्रेरणा और मंगल आशीर्वाद से पाश्चात्य संस्कृति से विलुप्त होते नैतिक संस्कारों को पुनः स्थापित करने के लिए सन 2000 से 2019 तक, देश के 15 राज्यों में लगभग 1200 स्थानों पर श्रुत संवर्धन ज्ञान संस्कार शिक्षण शिविर का सफल आयोजन होता आ रहा है। शिक्षण शिविर को सफल बनाने के लिए श्रुत संवर्धन संस्थान मेरठ, संस्कृति संरक्षण संस्थान दिल्ली एवं शिक्षण शिविर समिति का सहयोग सराहनीय, प्रशंसनीय है। ऐसे महान संत का इस  जन्म भारत देश की वसुंधरा पर होना और भारतीय संस्कृति को जीवंत रखने का मार्गदर्शन मिलना हम सभी का  पुण्य का उदय है। 

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