चौवीस तीर्थंकरों एवं मानस्तंभ में विराजमान 8 प्रतिमाओं का भव्य जुलूस

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अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

सिलवानी – संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के परम साधक शिष्य वात्सल्य मूर्ति मुनि श्री समतासागर जी महाराज एवं ऐलक श्री निश्चय सागर जी महाराज के सानिध्य में श्री जी का मंगल विहार श्री पार्श्वनाथ जिनालय पुराने मंदिर जी से नये त्रिमूर्ति जिनालय में विराजमान करने हेतु संपन्न हुआ। इस अवसर विभिन्न रथों पर चौबीस तीर्थंकरों की जिन प्रतिमाऐं तथा मान स्तंभ पर 8 प्रतिमाओं को नये त्रिमूर्ती मंदिर में भव्य जुलूस के रूप में ले जाकर नवीन वेदिओं पर एवं मान स्तंभ पर विराजमान किया गया। ज्ञातव्य रहे उपरोक्त सभी प्रतिमाऐं आचार्य गुरूदेव श्री विद्यासागरजी महाराज के आशीर्वाद से पूर्व में हुये पंचकल्याणक में प्रतिष्ठित कर ली गई थी। इस अवसर पर मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि आज जो आसमान पिघला है,वह आचार्य गुरूदेव के संकल्प शक्ति के कारण हुआ आज का विहार आचार्य श्री का सबसे लंबा विहार हुआ लगभग 12 कि. मी वह आगे बड़े।

मुनि श्री ने हरिवंशराय बच्चन की पक्तियाँ
वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी,
माँग मत, माँग मत, माँग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु स्वेद रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
सुनाते हुये कहा कि आचार्य श्री एक बार जो संकल्प कर लेते हें उसे अवश्य पूरा करते है। मुनि श्री ने सिलवानी नगर के सभी कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद देते हुये कहा कि सभी कार्यकर्ताओं के चहरों पर प्रसन्नता के भाव थे। जब शाम का आलम ऐसा है, तो सुबह का आलम क्या होगा। उन्होंने कहा कि ऐसी ही गुरु भक्ती से सिलवानी वालों का उत्साह चरम सीमा पर था यंहा के त्यागीवृति एवं पाठशालाओं से जुड़े बहुत सारे कार्यकर्ता है। उन्होंने सिलवानी समाज की तारीफ करते हुये कहा कि यंहा के बुजुर्ग यंहा कि बहु बेटियां जब उत्साह से सामुहिक पूजन करते है तो उनका उत्साह देखते ही बनता है।इस अवसर पर समैया समाज की तारीफ करते हुये सभी त्यागी वृतिओं को आशीर्वाद प्रदान किया। इस अवसर पर ऐलक श्री निश्चय सागर जी महाराज आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज की स्तुति करते हुये कहा यह सागर से गहरे और हिमालय से ऊंचे है उन्होंने आचार्य गुरुवर के संकल्प की बात करते हुये कहा कि जब उनका अमरकंटक की ओर विहार चल रहा था हर्फीज रोग उनके पैरों में हो गया था जो गुरुदेव एक किलोमीटर भी नहीं चल पा रहे थे वह 17 कि. मी. का निरंतर विहार करते हुये अमरकंटक की पहाड़ी पर अपनी संकल्प शक्ति के कारण चड़ गये।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन विदिशा,मध्यप्रदेश
संपर्क – 7828782835/8989696947

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