जैन समाचार

भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर के प्राचीन मन्दिर में किया गया भव्य पुजन एवं शांतिधारा


अहिंसा क्रांति


कुण्डलपुर (नालन्दा/बिहार) ।  जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर एवं वर्तमान शासन नायक भगवान महावीर स्वामी के  गर्भ एवं जन्म कल्याणक भूमि *श्री कुण्डलपुर जी दिगम्बर जैन प्राचीन तीर्थ क्षेत्र नालन्दा (बिहार) में बुधवार को गणिनी आर्यिका श्री 105 सौभाग्यमती माता जी, आर्यिका 105 श्री शिक्षामती माताजी, आर्यिका 105 श्री संक्षेपमती माता जी, क्षुल्लिका 105 श्री सुव्रत श्री माता जी एवं बालब्रह्मचारी श्री पंकज भैया जी* के मंगल सानिध्य में वृहद पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा का कार्यक्रम धूमधाम से मनाया गया। पुजन एवं शांतिधारा के पुण्यार्जक श्रीमान राजु वीना जी शाहा, मंडावी, सुरत (गुजरात) के ओर से सम्पन्न की गई। जिसे जैन धर्मावलंबियों ने फेसबुक लाइव के माध्यम से घर बैठे दर्शन  लिया । आज कोरोना महामारी के कारण सभी जैन मंदिरों में सन्नाटा है। पर्यटकों का आवागमन बिल्कुल ही बंद है। जिसके कारण मंदिरों की व्यवस्था पर भी बुरा असर देखने को मिल रहा है। गणिनी आर्यिका 105 श्री सौभाग्य मति माता जी ने अपने प्रवचनों में कहा कि – भगवान महावीर स्वामी ने दुनिया को पंचशील सिद्धांत अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य पर जोर दिया था तथा *अनेकांतवाद, स्याद्वाद* और अपरिग्रह का प्रयोग स्वयं में किया।

जैन धर्म मे *सम्यक दर्शन* को विशेष महत्ता दी गयी है जिसका तात्पर्य है जो वस्तु जैसी है, जिस रूप में स्थित है, उसका वैसे ही दर्शन करना या उसमें वैसा ही विश्वास करना है । माता जी ने कहा भगवान महावीर के सिद्धांतों को किसी काल, देश अथवा सम्प्रदाय की सीमा में नही बाँधा जा सकता है। यह प्राणीमात्र का धर्म है। इस प्रकार दूसरे से जितने के लिए अपनी शक्ति, समय और श्रम को व्यर्थ नही किया “परस्परोग्रहो जीवनाम” इस संक्षिप्त सूत्र द्वारा भगवान महावीर ने सम्पूर्ण विश्व को संयम से पर्यावरण संतुलन का संदेश पढ़ाया है। भगवान महावीर के निर्वाण को आज 25 सौ वर्ष से भी अधिक समय पूर्ण होने जा रहा है।

इन ढाई हजार वर्षों से हमारी श्रद्धा, आस्था पूर्वाचार्यों के कथन से जुड़ी रही है। जब कोई प्राणी किसी सिद्धान्त, न्याय या अन्य विषयों के पथ से डगमगाने या दिशाभ्रमित होने लगता है तब – तब हमें हमारी जिनवाणी से ही समाधान प्राप्त होते है। प्रवचन के समाप्ति के पश्चात मौजूद भक्तजनों ने आशीर्वाद प्राप्त किया।दिगम्बर जैन कोठी के प्रबंधक श्री जगदीश जैन ने बताया कि – भगवान महावीर के “जिओ और जीने दो” का प्रमुख सिद्धांत हम सभी को पालन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को सर्वप्रथम दुसरो को कष्ट दिए बिना ही स्वयं जीने का प्रयास करना चाहिए। यदि वह दूसरों को दुखित करता है तो वह स्वयं सुखी नही हो सकता। इसलिए हमारे प्रयास और कार्य परस्पर सापेक्ष भावना से हो ताकि हम में मानवीयता बनी रहे। “सादा जीवन उच्च विचार” की प्रवृति बने तब हम पुनः “वसुधैव कुटुम्बकम” की जीवंतता को अंकित कर सकते है और एक नई क्रांति को जन्म दे सकते है।

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