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आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज का ४८ वां समाधि दिवस

दिवसरानोली के महाकवि आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज के समाधि दिवस पर भावभीनी विनयाजलि

अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

सीकर- 22 मई 2020 सीकर के ग्राम रानोली के महाकवि आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज 20 वीं सदी के दिगंबर जैन आचार्यों में से है जिनके द्वारा कई संस्कृत महाकाव्यों की रचना करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने विश्व वंदनीय आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज को दीक्षा दी।

उनका जन्म पंडित के रूप में हुआ था। श्री भूरमल जी छाबड़ा (पंडित श्री भूरामल जी छाबड़ा)। उनके पिता श्री चतुर्भुज जी और माता श्रीमति गृहिणी देवी थीं। वह पाँच भाइयों में से दूसरे थे (छगनलाल सबसे बड़े और गंगाप्रसाद, गौरीलाल और देवदत्त छोटे भाई थे)। अपने गाँव में प्राथमिक अध्ययन पूरा करने के बाद, उन्होंने आगे बनारस में संस्कृत का अध्ययन किया।

ब्रह्मचर्य वर्ष 1947 विक्रम संवत 2004 में लिया उन्होंने आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज द्वारा 1955 वि. स. 2012 में क्षुल्लक दीक्षा प्रदान की गयी थी । तब उन्हें क्षुल्लक श्री 105 ज्ञानभूषण सागर जी महाराज नाम दिया गया था। उन्हे आचार्य श्री 108 शिवसागर जी महाराज द्वारा मुनि दीक्षा प्रदान की गयी , जो 1959 में खनिया जी, जयपुर में प्रदान की गयी।उन्हें 1968 में राजस्थान के नसीराबाद में आचार्य पद प्रदान किया गया 1 जून, 1973 को नसीराबाद में समाधि प्राप्त की।

सीकर के पंडित जयंत शास्त्री ने बताया कि आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज संस्कृत में एक विशेषज्ञ के रूप में, वह संस्कृत में एक महान संगीतकार थे। कम से कम 30 शोधकर्ताओं ने उनके कार्यों का अध्ययन किया और डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया। उनके काम पर कम से कम 300 विद्वानों ने शोध पत्र प्रस्तुत किए हैं।

उनकी रचनाओं में 4 संस्कृत महाकाव्य और 3 और जैन ग्रंथ शामिल हैं और वह भी उस समय में जब संस्कृत रचना लगभग अप्रचलित थी। इन कृतियों ने हमेशा आधुनिक संस्कृत विद्वानों को आश्चर्यचकित किया है। महाकवि आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज सचमुच दिव्यद्रष्टि वाले थे जिसका साक्षात उदाहरण आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज के रूप मे है आज वह सम्पूर्ण विश्व पर जिनधर्म की पताका लहरा रहा है

जयंत शास्त्री ने बताया कि आचार्य श्री की है विशेषता रही की जिनको उन्होंने शिष्य बनाया उनको अपना आचार्य पद दे दिया सीकर के प्रियंक गंगवाल ने बताया कि आचार्य श्री एक निष्प्रही साधक थे उनकी निष्काम साधना हर किसी को चकित कर देती थी वह उदारमना थे

एक संस्मरण जब सन 1968 मे मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज को आचार्य पद लेने को कहा तब उन्होंने स्वीकार नही किया आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज तो ज्ञान का भंडार थे उन्होंने कहा तुम मेरे शिष्य हो तुम्हें मुझे गुरु दक्षिणा देनी होगी तब आचार्य श्री ने मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज को आचार्य पद से नसीराबाद में प्रदान किया

तब जो हुआ व आज भी सभी को चकित कर देता है आचार्य पद देने उपरान्त आचार्य श्री ज्ञान सागर जी महाराज अपने आचार्य आसन से उठकर मुनि दीर्घा मे आकर विराजमान होकर जो कहा सभी को भावुक कर गया उन्होंने कहा है आचार्य मुझे अपना शिष्य बना ले यह आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज की उदारता को परिलक्षित करता है

राजस्थान हो गया निहाल
रानोली के संत तूने कर दिया कमाल
चरित्र की हो गंगा तुम ज्ञान की टकसाल
रानोली के सन्त तुने कर दिया कमाल

ब्यूरो चीफ देवांश जैन (विदिशा) मध्यप्रदेश

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