१६ दिवसीय ऑनलाइन “भक्तामर महिमा आराधना शिविर” का आयोजन शनिवार से होने जा रहा

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अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

विदिशा(भद्दलपुर) – जो व्यक्ती वने वनाऐ काम को छेड़ने और विगाड़ने के लिये दूसरों के कान को छेदते रहते है, ऐसे लोग ही कन्छेदी कहलाते है पृकृति मां ने हमारी आंखों को यह सुविधा दी है,कि यदी हम कोई दृश्य नहीं देखना चाहते हें तो हम अपनी आंखों को वंद कर सकते है, लेकिन यदी हम कोई वात नहीं सुनना चाहते है, तो अभी तक पृकृति मां ने कोई ऐसा ढक्कन नहीं वनाया कि हम तुरंत अपने कानों को भी वंद कर सकें, उपरोक्त उदगार मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने शीतलधाम हरीपुरा में जैन तत्व वोध की ओन लाईन कक्षा को संवोधित करते हुये व्यक्त किये। उन्होंने तीर्थंकर भगवन्तों के कल्याणकों में दीक्षा और ज्ञान कल्याणक के विशेष महत्व को दर्शाते हुये कहा कि जव तक तीर्थंकर वालक दीक्षा को ग्रहण नहीं करते तब तक केवल्यज्ञान  नहीं होताऔर यदि कैवल्य ज्ञान ही नहीं होगा तो दिव्यध्वनी  कंहा से खिरेगी?

मुनि श्री ने कहा कि राजमहलों में रहने वाले राजा तो वन सकते है, लेकिन महाराजा  नहीं वन सकते, महाराजा वनने के लिये तो सवसे पहले घर का त्याग करना आवश्यक है, गृह त्याग कर वह स्वं दीक्षा ले लेते है, उनको दीक्षा के लिये कोई गुरु नहीं वनाना पड़ता है, वह कालचक्र के 24 घंटो को सम्हाल लेते है, और ऐसे तीर्थंकर पुरुष दीक्षा लेकर तुरंत मौन ले लेते है, वह न तो किसी को हाथ उठाकर के आशीर्वाद देते, और न किसी को कोई उपदेश देते फिर भी जिसके यंहां तीर्थंकर के आहार हो जाते है, वह खुशी में लोटपोट हो जाता है, जैसे कि आप लोगों के यंहा महाराज के आहार हो जाते है, तो कितनी खुशी मिलती है, और यदि आचार्य महाराज के आहार हो जायें तो फिर कहना ही क्या मन गदगद होकर खुशी से लोटपोट हो जाता है।

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मुनि श्री ने कहा कि तीर्थंकर की प्रकृति में यह सभी पुण्य की प्रकृतियां जन्म के साथ ही रहती है, वह धर्म का प्रवर्तन करते है, दीक्षा के उपरांत से ही अखंड मौन को धारण कर लेते है जब तक उनको कैवल्य ज्ञान नही हो जाता तब तक वह किसी का भी आलंवन नहीं लेते। हालांकि उनकी सारी व्यवस्थाऐं स्वर्ग से चला करती है, तीर्थंकर जब दीक्षा लेते है उस स्थान का चयन होता है, एवं पंचमुष्टी केशलोंच कर दीक्षा धारण करते ही  “नमः सिद्धेभ्याः “कहकर मौन हो जाते है। वर्तमान समय में तो मुनिजन भाषासमिती और सत्य महावृत के आधार पर प्रवचन आदि करते है, क्यू की वह कोई धर्म का प्रवर्तन नहीं कर रहे है, वह जो कुछ भी सुना रहे है, वह तीर्थंकंर की वाणी को ही सुना रहे है। उन्होंने कहा कि आप लोग दर्शन करने आते हो, और यदि हमारी नजर न मिल पाऐ और हम आपकी नमोस्तू का जबाव न दें पाऐ तो.. मन में फौरन आ जाऐगा कि महाराज कंही हमें भूल तो नही गये? आदि आदि ख्याल सताने लगते है। 

मुनि श्री ने कन्छेदी शव्द की नई व्याख्या करते हुये कहा कि पहले जिनके कान में छिद्र होता था उसे कन्छेदी कहते थे, लेकिन आजकल तो विना कान छिदे भी कई कनछेदी मिल जाते है। उन्होंने एक नई परिभाषा वताते हुये कहा कि सुझाव दैना अच्छी वात है, लेकिन जो व्यक्ती वने वनाऐ काम को छेड़ने और विगाड़ने के लिये दूसरों के कान को छेदते रहते है, ऐसे लोग ही कन्छेदी कहलाते है।और में ऐसे लोगों को विल्कुल भी पसंद नही करता। मानव स्वभाव के ये दोष है, और इनसे सभी विरक्त हों, और कल से उजियारा पक्ष शुरु हो रहा है, जिनको अपना पक्ष शुक्ल पक्ष की भांति उजला उजला ही रखना है, वह सभी भक्तामर महिमा के इस १६ दिवसीय अनुष्ठान में अवश्य शामिल होकर पुण्य लाभ अर्जित करेंगे।

प्रवक्ता अविनाश जैन ने वताया १५अक्टूवर २०२० को मुनि श्री द्वारा पूंछे गये दौनों प्रश्नों के उत्तर में वताया कि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के दीक्षा उपरांत सर्वाधिक चातुर्मास अभि तक के इतिहास में अजमेर जिला राजस्थान में संपन्न हुये है, सन्1968 से लेकर सन् 74 तक आचार्य श्री राजस्थान में रहे एवं 6 वार उनका चातुर्मास अजमेर जिले मेंही संपन्न हुआ दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुये मुनि श्री ने वताया कि आचार्य श्री का नन्ही  देवरी मे आगमन 4 बार हुआ है। 1986, 1993, 2015, 2017 इस प्रकार से ये दौनों उत्तर सही है, एवं सभी सही उत्तर दैनै वालों को उन्होंने अपना आशीर्वाद प्रदान किया। एवं आज के नये प्रश्न इस प्रकार है, जिनका उत्तर कल प्रातःप्रवचन सभा में दिया जाऐगा। (१) तीर्थंकर भगवान दीक्षा लेते समय “नमः सिद्धेभ्याः” कहकर दीक्षा धारण क्यू करते है? ओम शव्द क्यू नहीं लगाते? (२) तीर्थंकंर भगवान संपूर्ण मुनि जीवन काल में उपदेश आदि क्यूं नहीं देते? मौन धारण क्यूं करते है? दौनों प्रश्नों के सही जबाव 9425684433 पर रात्री 8 वजे तक ही हिंदी भाषा में ही स्वीकार रहेंगे।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन विदिशा, मध्यप्रदेश
सम्पर्क – 7828782835 / 8989696947

श्री १००८ शीतलनाथ भगवान के गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान कल्याणको से सुशोभित भूमि भद्दलपुर, विदिशा (म.प्र.) स्थित निर्माणाधीन समोशरण मंदिर

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