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हम सच्चाई व यथार्थ के प्रति प्रणति बनाए रखें : आचार्य महाश्रमण

AHINSA KRANTI NEWS / RAJENDRA BOTHRA


हैदराबाद। भगवान महावीर की वाणी के पथदर्शक , तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अपने मंगल उद्बोधन में फरमाया कि ठाणं आगम में सात प्रवचन निन्हवों का प्रसंग चल रहा है। सात प्रवचन निन्हव हुए है उनमें सातवीं विचारधारा जो जैन शासन के सिद्धांत के प्रतिकूल थी वह थी अबद्धिक विचारधारा। इस विचारधारा के प्रवर्तक आचार्य गोष्ठामाहिल थे। दशपुर नामक नगर में इस विचारधारा की उत्पति हुई थी। भगवान महावीर के निर्वाण के ५८४ वर्ष बाद दशपुर नगर में इस अबद्धिक मत का प्रारंभ हुआ। दशपुर नगर में एक ब्राह्मण पुत्र आर्यरक्षित रहता था। उसने अपने पिता से बहुत ज्ञान अर्जित किया था।

उनकी अध्ययन में विशेष रूचि थी। विशेष ज्ञानार्जन के लिए वे पाटलिपुत्र गए। वहां जाकर उन्होंने विशेष ज्ञान प्राप्त किया। वहां से लौटने के बाद माँ की प्रेरणा से वे जैन शासन में साधु बन गये। उस समय जैन आचार्य तौशलीपुत्र थे उनके पास उन्होंने भगवती दीक्षा ग्रहण की और बाहरवें अंग दृष्टिवाद का अध्ययन शुरू किया। कुछ समय बाद आर्यरक्षित आचार्य बन गए। उनके तीन प्रमुख शिष्य थे। उन तीनों में से एक प्रमुख शिष्य दुर्बलिका पुष्यमित्र को उन्होंने अपना उतराधिकार सौंप दिया। आचार्य दुर्बलिका पुष्यमित्र वाचना दे रहे थे। इस बीच उन्हें कुछ काम से जाना पड़ा तो उनका शिष्य विन्ध्य उनकी बात को दोहरा रहा था। गोष्ठामाहिल भी वहीं था वह इस प्रसंग को सुन रहा था। कर्मबंध का प्रसंग चल रहा था। प्रश्न आया की कर्मबंध कितने प्रकार का होता है। विंध्य ने बताया की कर्म बंध तीन प्रकार का होता है – स्पृष्ट, स्पृष्ट बद्ध व स्पृष्ट बद्ध निकाचित। स्पृष्ट अर्थात कर्म पुद्गलो का आत्मा से स्पर्श मात्र होना, स्पृष्ट बद्ध अर्थात कर्म पुद्गल आत्मा के बंधकर रह जाते हैं व स्पृष्ट बद्ध निकाचित अर्थात कुछ कर्म पुदगल ऐसे होते है जो जीव के प्रदेशों से प्रगाढ़ रूप से बंध जाते हैं। कालांतर में ये सभी पुद्गल अलग भी हो जाते है। यह बात मुनि विंध्य ने कर्म के पूर्व के आधार पर बताई। शिष्य गोष्ठामाहिल ने जब यह बात सुनी तो उसने कहा, यह बात तो सही नहीं है। कर्म आत्मा के बंधते नहीं सिर्फ स्पृष्ट होते है।

अगर कर्म आत्मा के बंध जाएंगे तो वापिस अलग नहीं हो सकते व मोक्ष होना भी संभव नहीं हो सकेगा। गोष्ठामाहिल ने कहा मुझे मेरा यह सिद्धांत सही लगता है। मुनि विंध्य ने कहा आचार्य जी ने भी पहले यही बात बताई थी में तो उन्हीं की बताई हुई बात बता रहा हूं। गोष्ठामाहिल बोला आचार्य जी ने बताई होगी लेकिन मुझे तो यह बात सही नहीं लगी। आचार्य जी ने व अन्य शिष्यों ने भी गोष्ठामाहिल को समझाने का प्रयास किया, परंतु वह नहीं माना। तब साधुओं ने तीर्थंकरों से बात जानने की बात कही व कायोत्सर्ग की आराधना कर देव को बुलाया गया। देव को सारी बात बताई गई व कहा कि आप तीर्थंकरों से पूछकर हमें बताएं कि सही बात क्या है। देव ने इस विषय में तीर्थंकरों से जानकारी प्राप्त कर बताया कि आचार्य जी व संघ जो कह रहा है वहीं बात सत्य है। गोष्ठामाहिल की बात गलत हो गई। परंतु गोष्ठामाहिल ने देवता की बात भी अस्वीकार कर दी। आचार्य दुर्बलिका पुष्यमित्र ने उसे अपनी बात पर पुनर्विचार के लिए भी कहा लेकिन वह जब अपनी जिद्द पर ही अड़ गया तो उसे संघ से अलग कर दिया गया। अब वह अलग रहते हुए अपने सिद्धांत अबद्धिकवाद का प्रचार करता रहा व जीवनभर जैन शासन से अलग ही रहा। इस प्रकार यह सात निन्हवों का प्रसंग आज संपूर्ण हुआ। हम सच्चाई के प्रति व यथार्थ के प्रति प्रणति बनाए रखें, समर्पण रखें। जिनेश्चर भगवान ने जो प्रवेदित किया है वो सत्य ही होता है। यथार्थ को प्राप्त करना हमारा सौभाग्य हो सकता है।\

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