सिद्धचक्र में – नवपद मे समस्त जिन शासन है या जिन शासन लघु संक्षिप्त स्वरूप सिद्धचक्र है : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

- Advertisement -

AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर। श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य विजय भव्यदर्शन सूरीश्वरजी म. ने धर्म संदेश में बताया कि –   श्री सिद्धचक्र यंत्र में मुख्य नवपद है । इस यन्त्र में ‘अर्हं’ अमृत है, जो केन्द्र में है । यह अमृत आराधक को अमर बना देता है । इस यन्त्र में आराध्य तत्त्वों के साथ सहायक तत्त्वों को भी स्थान दिया गया है । आराध्य यानी उपास्य । जिन की उपासना हम करते हैं उनको उपास्य कहा जाता है । उपास्य-आराध्य तत्त्वों की उपासना या आराधना करनेवाला स्वयं उपास्य या आराध्य बन जाता है । उपास्य और उपासक अथवा आराध्य और आराधक के बीच में उपासना या आराधना होती है, जो उपास्य-उपासक के बीच में सेतु का करती है ।

यह सेतु ही उपासक को उपास्य तक पहुँचाता है । उपास्य है, उपासक है किंतु उपासना अगर नहीं है तो दोनों के बीच अनुसंधान नहीं हो पाता । अनुसंधान होना बेशक जरूरी है ।सिद्धचक्र में – नवपद मे समस्त जिन शासन है या जिन शासन लघु संक्षिप्त स्वरूप सिद्धचक्र है, ऐसा हम कह सकते है ।सिद्धचक्र यन्त्र में क्यां है । केन्द्र में तांत्रिक पद्धति से, मंत्र लिपि में ‘ऊँ ह्रीँ अर्हं’ लिखा हुआ रहता है । मतलब, यन्त्र होने के बावजूद इस में मन्त्र और तन्त्र भी है । तंत्र-मंत्र और यंत्र तीनों के कार्य इससे संपन्न होते है । बाह्य-अभ्यंतर तमाम व्याधि-उपाधि का इलाज इससे होता है । इस के प्रथमवलय में नवपद है । नवपद में पंच परमेष्ठी के अलावा दर्शन-ज्ञान-चारित्र और तप आता है । पंच परमेष्ठी जो नवकार मंत्र में भी निहित है ।

- Advertisement -

परम-श्रेष्ठ पद पर विराजमान होने के कारण उनको परमेष्ठी कहे जाते है । श्रेष्ठ पद में कारणभूत है – सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्र और सम्यक्तप । मतलब, परमेष्ठी तक पहुंचने के लिए ये चारों प्रकार का धर्म अनिवार्य है । धर्म के कारण ही तो आत्मा धर्मी कहलाती है । धर्म आधेय है, धर्मी आधार है । सिद्धचक्र शरीर और आत्मा… सबको पनाह-रक्षण देनेवाला है ।उसके बाद अ-आ इत्यादि 16 स्वर और 33 व्यंजनों की पूजा होती है । स्वर-व्यंजनों के माध्यम से ही द्वादशांगी का निर्माण होता है । द्वादशांगी बनानेवाले गणधर भगवंत सर्वाक्षर संनिपातिनी लब्धि और बीजबुद्धि के धनी होने के कारण उनकी रचना निर्दोष और शुद्ध होती है । सत्य निथरनेवाली होती है ।

असत्य का अंश भी उसमें नहीं होता । मतलब, 32 दोष से मुक्त और आठ गुणों से युक्त होती है । उसके साथ अनाहत बाद की पूजा होती है । पुद्गल के टकराव के बिना आत्मा से उठनेवाली ध्वनि को अनाहतनाद कहते है । नये वलय में 48 लब्धिपदों की पूजा होती है । ऐसे तो अनंत लब्धि होने के बावजूद मुख्य 48 लब्धिपदों को यहाँ स्थान दिया है । इस के बाद साढ़े तीन रेखाओं से इसका आवेष्टन किया जाता है । क्रौँ से उसकी पूर्णाहुति होती है, जब की शुरुआत ह्रीँ कार से होती है । दोनों बीजाक्षर का कई महत्त्वपूर्ण स्थान है । नये आगे के वलय में आठ गुरुपादुका की पूजा होती है । यहाँ तक पूज्य-उपास्य तत्त्व है । आगे के वलयों में सहायक तत्त्वो की उपासना होती है । उस में जयादि 8 दिवी, 24 यक्ष, 24 यक्षिणी, 16 विद्यादेवी, नवग्रह, दस दिक्पाल, नौ निधि, 4 लोकपाल-द्वारपाल वगैरह का स्थान है । कलश के बाहर क्षेत्रपाल सिद्धचक्र के अधिष्ठायक विमलेश्वरदेव, चक्रेश्वरीदेवी, आदि का स्थान है ।-आचार्य विजय भव्यदर्शन सूरि ।

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

Leave A Reply

Your email address will not be published.