साधना की गहराई और भावनाओं की उज्जवलता से ही आपके अंदर प्रज्ञाश्रमण प्रदीप्त रहता है : मुनि श्री समता सागर जी महाराज

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अहिंसा क्रांति /ब्यूरो चीफ देवांश जैन

विदिशा(भद्दलपुर) – सूर्य अस्ताचल की ओर जा रहा था,उसने कहा कि मेरी जबाव दारी को पूर्ण कौन करेगा? सारी पृकृति शांत हो गयी तभी एक माटी का दीपक आगे वड़ा, उसने कहा कि में आपके समान सामर्थवान तो नहीं लेकिन मेरे में जितनी शक्ती और सामर्थ है, में इस अंधेरे से मुकावला करूंगा, संसार में सभी सामर्थवान हों यह जरूरी तो नहीं,जब एक छोटा सा दीपक उस अंधेरे से लड़ने की क्षमता रखता है, और उस अंधेरे को दूर कर सकता हें,तो योगदान तो उस गिलहरी का भी था जो भावनाओं से एक फूस का टुकड़ा लेकर पुल वनाने को चल पड़ी थी, आपका छोटा सा भी योगदान यदि शीतलधाम को मिलता है तो भावनाओं का यह समवसरण वहूत जल्दीअवश्य पूर्ण होगा।उपरोक्त उदगार मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने भक्तामरस्तोत्र आराधना शिविर के छंटवे दिवस व्यक्त किये।

उन्होंने कहा कि आज सारा संसार कोरोना महामारी से परेशान है, ऐसे आपत्ति विपत्ती के काल में आप सभी लोग शीतलधाम में वैठकर प्रभु की भक्ती और आराधना कर रहे है, मुनि श्री ने कहा कि जंहा पर व्यक्ती सुवह घर से निकलता है,और सांयकाल लौटता है तो थका हारा महसूस करता है,वह यदि प्रातःकालीन वेला में आकर यदि प्रभु की भक्ती और स्मरण कर अपने कार्यस्थल की ओर आगे वड़ता है, तो उसके अंदर एक विश्वास रहता है, कि कोई तो है, जो मुझे ऊर्जा प्रदान कर रहा है, और ऐसी शक्ती और भक्ती ही आपको दिन भर ऊर्जा प्रदान करती है, साधना की गहराई और भावनाओं की उज्जवलता से ही आपके अंदर प्रज्ञाश्रमण प्रदीप्त रहता है,फिर आप जो भी कार्य करते है उसमें आपकोअसफलता का मुख नहीं देखना पड़ता।

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आचार्य मानतुंगाचार्य जी भक्तामरस्त्रोत्र के सोलह वे काव्य में कह रहे है कि प्रभु ‘आप ऐसै अनौखे अदभुत, अनुपम दीपक हो जिसमें न धूम की जरुरत है, न वाती की जरुरत है, न तैल की जरुरत है, फिर भी तीनों लोकों में प्रकाशित हो रहे हो। मुनि श्री ने कहा कि यह उस कैवल्यज्ञान की ही महिमा ही तो है, जो उस सूर्य के प्रकाश से भी अधिक है,जो कि सारे संसार को प्रकाश प्रदान कर रहा है। आचार्य मानतुंगाचार्य जी कहते है कि हे भगवन् आपकी महिमा अपरंपार है, उस सूर्य को भी कभी मेघ रोक लेते है, तो कभी राहू डस लेता है। लेकिन आपतो अदभुत ज्ञान के भानू हो, जो सदैव प्रकाशमान रहता है। आपका मुखकमल तो उस चंद्रमा से भी ज्यादा आच्छादित है, जो सदा उदित रहता है, जो संसार के मोह रुपी अंधकार को नष्ट करता है। हे भगवन् आपके आभामंडल में सदैव तीनों लोक प्रकाशित होते है, इसके कारण कोई ही विरोधी तत्व आप पर हांवी नहीं हो पाते, और जो आपकी आराधना करता है उससे सांसारिक विरोधियों को भी असफलता का सामना करना पड़ता है।

उपरोक्त जानकारी देते हुये प्रवक्ता अविनाश जैन ने वताया कि शीतलधाम इस समय प्रभु की भक्ती का केन्द्र वना हुआ है, प्रतिदिन प्रातः६:३० वजे से अभिषेक और शांतिमंत्रों के साथ मुनि श्री के मुखारविंद से शांतिधारा संपन्न हो रहीहै, वंही सोलह दिवसीय श्री भक्तामर महिमा आराधना शिविर एवं ४८ दिवसीय भक्तामर दीप पाठ का आयोजन सांयकाल६:४५ से चल रहा है। प्रतिदिन नये पुण्यार्जन करने वालेस्थानीय श्रद्धालु ही नहीं होते वल्कि इस कोरोना काल में जंहा पर आने जाने में लोग असुविधा महसूस करतेहै, वंही भगवान शीतलनाथ स्वामी की चार कल्याणक भूमी संपूर्ण भारतवर्ष की आस्था का केन्द्र वनी हुई है।एवं प्रतिदिन वाहर के श्रद्धालुओं द्वारा शांतिमंत्रों के साथ शांतिधारा एवं श्री भक्तामरस्तोत्र पाठ को संपन्न करा रहे है।

आज की शांतिमंत्रों के साथ शांतिधारा का सौभाग्य गोंदिया महाराष्ट्र निवासी श्री अजीत कुमार जैन श्री मति चंद्रप्रभा जैन को मिला जिसकी धारा विदिशा में अंकित अविनाश जैन मनभावन ने की। तथा श्री इन्द्रकुमार जी विदिशा को मिला। प्रतिदिन भक्तामर पाठ की संयोजना चल रही है जिसका संचालन श्री संजय मामा कर रहे है। 25 अक्टूवर दशहरा के दिन विशेष रुप से भक्तामर पाठ का आयोजन पूर्ण रात्री तक करने की संयोजना कार्यकर्ताओं ने रखी है। जिसमें श्री राजाराम जी नन्हीदेवरी, ब्र. भैयाडा. संजय जी गंजवासौदा, ब्र.विकासभैयाजी, ब़.राजेश भैया जी, ब़.संजय भैयाजी, ब्र. अनूप भैया जी विदिशा, सुवोध, भुसावल,आदित्य परतवाड़ा, दमोह आदी उपस्थित रहेंगे।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन विदिशा, मध्यप्रदेश
सम्पर्क – 7828782835 / 8989696947

श्री १००८ शीतलनाथ भगवान के गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान कल्याणको से सुशोभित भूमि भद्दलपुर, विदिशा (म.प्र.) स्थित निर्माणाधीन समोशरण मंदिर

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