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समय बीत जाने पर अपनी गलती महसूस भी हुई. उससे क्यां फायदा : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर।  श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य विजय भव्यदर्शन सूरीश्वरजी म. ने धर्म संदेश में बताया कि –  श्री दशवैकालिक नामक आगम ग्रंथ में आचार्यभगवंत श्री शय्यंभवसूरिजी म. ने बताया – ‘काले कालं समायरे।’ अर्थात्  जो कार्य जिस समय पर करना है, उसी समय पर ही करें । साध्वाचार में हर कार्य जिस समय पर करना है, उसी समय पर ही करें । साध्वाचार में हर कार्य का समय निश्चित किया गया है । उसी तरह श्रावकों के लिए भी यह सूत्र बहुत उपयोगी ही है । नीतिकार भी इस सूत्र का समर्थन करते है । कोई भी धर्म वाले इस सूत्र सुभाषित के विरुद्ध में नहीं है ।आचारांग सूत्र में गणधर भगवंत श्री सुधर्मस्वामीने भी फरमाया है कि – योग्य समय पर कार्य करनेवाले का उद्यम-श्रम सफल होता है ।

समय बीत जाने पर कितना भी खर्च करलो, कितना भी परिश्रम उठ़ालो, तन-मन-धन वगैरह कुरबान कर दें… उसकी क्या कीमत है ?  उससे क्या फायदा होगा ? ‘बुंद से गई होज़ से नहीं आती’ यह कहावत भी इन के समर्थन में ही है न ?किसान के जरिए इस बात को सोचें तो ऐसा कह सकते है – अगर बारीश आने पर किसान बोआई न करे तो, खेत-बीज वगैरह सब होने के बावजूद वो फसल नहीं पा सकेगा । किसान को हरएक चीज का समय समय पे ध्यान रखना पड़ता है । समय चुक गये तो नुकसान ही भुगतना पड़ता है । फिर पश्चात्ताप होता है । लेकिन जो समय हाथ से निकल गया वो वापस नहीं आता ।लोहा गरम है तब तक उसके ऊपर घन चलाया तो योग्य आकार दे सकते है । वो ही लोहा ठंड़ा होने पर कितने भी घन-हथोड़ा चलाओं… आकार नहीं बनेगा । मौके पर ही किया काम सफल होता है । बस-गाड़ी-विमान में जाना है तो समय पर ही पहुंचना पड़ता है ।

समय बीत जाने पर पहुँचे तो आपकी मुसाफरी नहीं हो पायेगी । बुकिंग करवाया होगा तो भी आप के लिए वो बस वगैरह रूकने वाले नहीं है । आपके पैसे भी वापस नहीं मिलते ।प्रवचन वगैरह में पैसे का चार्ज न होने के कारण लोग अपनी फुरसद से आते है । कभी भी उठ़के चले जाते है । उसमें होनेवाले अविनय-अवज्ञा आशातना के बारे में सोचते भी नहीं है ।धर्म साधना के लिए भी शास्त्रकार भगवंत वो ही कहते है – अगर बचपन में – युवानी में धर्म नहीं किया तो बुढ़ापे में क्या कर पाओंगे । वैराग्य शतकादि ग्रंथों में लिखा है – जब तक इन्द्रियाँ सतेज है, अपने कार्यों मे सक्षम है, जब तक शरीर को रोगों ने घेरा नहीं है, रोगों का आक्रमण नहीं हुआ है, जब तक हाथ-पैर में ताकत है … तब तक धर्म कर लों ।

आयुष्य का भी भरोसा नहीं है । मौत कभी भी आ सकती है । इस में भी समय की कीमत दिखाई है । अगर बचपन खेल मे खो दिया, जवानी में मौज-शौक किए, निंद की मज़ा ली… तो बुढ़ापे में रोने के अलावा कोई रास्ता नहीं रहेगा । समय रहते ही धर्मकार्य कर लें । संसार में कई सारीं उलझने आती है, जो धर्म में विघ्न ड़ालने का काम करती है । सूयडांग नाम के आगम में गणधर भगवंत कहते है – जो व्यक्ति समय पर अपना कार्य कर लेता है, उसको पीछे पछताना नहीं होता । समय बीत जाने पर अपनी गलती महसूस भी हुई… उससे क्यां फायदा ? तब तो कहा गया कभी प्यासे को पानी पीलाया नहीं… बाद अमृत पीलाने से क्या फ़ायदा ?। 

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