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सत्यार्थ उपदेश : दिगम्बराचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज

विदिशा अहिंसा क्रांति/ब्यूरो चीफ देवांश जैन

-आत्मार्थी भव्य जीवों के लिए तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी ने जो सत्यार्थ तत्वोपदेश दिया था वह सम्प्रति काल में अत्यंत उपयोगी है। उस उपदेश को क्रिया रूप में पालन नही कर पायेगा, जिसके भीतर स्व पर करूणा, दया और क्षमा होगी। 

जिस व्यक्ति के अन्दर स्व के प्रति क्षमा, करूणा, दया भाव नहीं है व सम्यक, उपदेश सुन भी नही पाएगा, फिर उनके अनुसार चलना तो बहुत कठिन कार्य है। जो सदुपदेश के अनुसार चलता है वह स्व- पर का हित कर लेता है।

 हिंसा, असत्य, चोरी, कुशील, परिग्रह आदि पापों का आश्रय वहीं लेता है जो क्षमा धर्म से अनभिज्ञ है। इसे यह भान ही नहीं है कि, स्व के प्रति ही अनर्थ करता हूँ।

पांच पाप करेगा, तो संसार में दु:खमय नरकादि दुर्गतियों में भ्रमण होगा। पशु-पक्षी बनकर भंयकर कर्मों के फल को सहन करना पड़ेगा। अशुभ कार्य का फल निश्चित रूप से कष्टप्रद ही होता है। अभक्ष्य भोजन, असत्य, कर्कशादि भाषण तन एवं मन दोनों को विकृत कर परिणामत: महामारी जैसे महारोग उत्पन्न करता है, फिर मानव की मानवता शिशक – शिशक कर रोती है।

तडफ़ – तडफ़ कर हाय – हाय करता है, इसलिए स्व पर करूणा करो, स्व को क्षमा करो। स्वच्छ भोजन, स्वच्छ भाषण करो। जीवों पर करूणा भाव, दृष्टि में अनेकान्त, वाणी में स्याद्वाद, चर्या में अहिंसा जहाँ होगी वहाँ सम्पूर्ण आपत्तियाँ स्वत: समाप्त हो जायेगी। सज्जन, हित चाहने वाले पुरूषों को शासन की सर्व – हितकारी आज्ञा को आस्था पूर्वक पालन करना चाहिए। नागरिकों को संकट – कष्ट के काल में परस्पर उपकार भाव रखना चाहिए, क्योंकि सब दिन एक से नहीं होते हैं। संकट के दिन भी चले जाऐंगे। धैर्य अनिवार्य और आवश्यक है। सबके दिन एक से नहीं होते, इसलिए सर्व प्राणियों पर क्षमा भाव धारण करो। गुणीजनों में विनय, हर्ष, दुखी जनों पर करूणा, प्राणी मात्र पर मैत्री भाव और विपरीत मार्ग पर चलने वालों पर माध्यस्थ भाव धारण करो।
तीर्थंकर वीर – महावीर का यही समीचीन धर्मोपदेश है। विश्व कल्याण के लिए अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रम्हचर्य और अपरिग्रह पंच – सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण अंग है। यही स्वयं पर परम क्षमा भाव है।

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