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संसार भी हमने ही बनाया और बसाया हैं : आचार्य उदार सागर महाराज

अहिंसा क्रांति


विदिशा(ब्यूरो चीफ देवांश जैन)-संसार भी हमने ही वनाया और वसाया हैं, तो इस संसार को घटाने का और इससे मुक्त होंने का रास्ता भी हमी को तलाश करना होगा। उपरोक्त उदगार आचार्य श्री उदारसागर जी महाराज ने रविवार को विदिशा नगर में आयोजित चार व्रह्मचारी भाई जिनकी दीक्षा आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज के आशीर्वाद से भिण्ड नगर में होंने जा रही हैं। उनको आशीर्वाद प्रदान करते हुये कही।

उन्होंने एक घटना को सुनाते हुये कहा कि एक युवक ने एक संत के  समझ एक जिज्ञासा रखी कि संसार क्या हैं, और इससे मुक्ति का मार्ग क्या हैं? संत ने उस युवक को जबाब न देते हुये एक महीन रेशम का धागा उठाया और कहा की इस धागे में गांठ लगा दो उस युवक ने वडी़ ही सरलता से उस धागे में गांठ लगा दी फिर संत ने कहा कि अभी अभी जो गांठ तुमने लगाई हैं उसे खोल दो संत का आदेश था सो वह युवक उस रेशम के धागे की गांठ को खोलने लगा वड़ी मसक्कत के वाद उस रेशम के धागे की गांठ को खोल पाया। संत ने उससे कहा जिस प्रकार से तुमने धागे में गांठ लगाई वह आसानी से कम समय में लग गयी उसी प्रकार यह जीव संसार में कर्म का वंधन वहूत ही आसानी से कर लैता हैं। लेकिन उन कर्म के वंधन को खोलना वड़ा ही कठिन कार्य हैं। गांठ का लग जाना ही संसार हैं और उस लगी हुई गांठ को खोलना ही मुक्ती हैं।

वह युवक संत जी के ईसारे को समझ चुका था और उसे जिज्ञासा का समाधान भी मिल गया था। आचार्य श्री ने कहा कि जो अपने आपको इन कर्म वंधनों से जकड़ा पा रहा है, वही इससे मुक्त होंने के वारे में सोचता हैं। जो यह सोचता है कि  में तो कर्म वंधनों से मुक्त हूं वह छूंटने का पुरुषार्थ क्यू करेगा। मुक्ती का प्रयास वही करता हैं जो जेल में वंद हैं। इसलिये पहले इस वात का अहसास तो करो कि मेरी यह आत्मा कर्मों के वंधनों से जकड़ी हुई हैं। यदि आत्मा को कर्म वंधन से मुक्त करना है तो पहले उस वंधन को महसूस तो करो। कर्म वंध को पहले स्वीकार तो करो। इस अवसर पर मुनि श्री उपशांत सागर जी महाराज ने भी संवोधित करते हुये कहा कि पहले धर्म के दो शव्द सुनकर के ही जीवों में परिवर्तन हो जाया करता था लेकिन आजकल घंटों प्रवचनों को सुनने केपश्चात भी परिवर्तन की छोड़ो परिवर्तन के भाव भी नहीं आते उन्होंने भगवान महावीर की पूर्व पर्याय में वह सिंहराज जो मांस को खाता था और वह एक दि. मुनिराज की वाणी को सुनता हैं, और वह संयम को ग्रहण कर लेता हैं। मुनि श्री ने कहा कि हम तो हमेशा यही उपदेश देते हैं कि आओ और महावृतों को धारण करो लेकिन यदि आप नहीं ले पा रहे हो तो कम से कम एक माला यदि आप णमोकार महामंत्र की फेर ली तो आपके जीवन का उद्धार हो जाऐगा।  

प्रवक्ता अविनाश जैन ने वताया आगामी समय में भिण्ड नगर में आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज के आशीर्वाद से चार दिगंम्वरी दीक्षा संपन्न होंने जा रही हैं।  जिसमें विदिशा जिले के गौरव वाल ब्र. मणीकांत भैया जी, वाल ब़. सार्थक भैयाजी भिण्ड, ब्र. श्री अंकित भैयाजी भिण्ड, एवं देवास भैयाजी देवेन्द्र नगर  रविवार को विदिशा आए एवं उन्होंने जैन भवन में आकर यंहा विराजित आचार्य उदारसागर जी महाराज से आशीर्वाद लिया।  दौपहर में जैन समाज द्वारा उनके सम्मान में एक शोभायात्रा स्टेशन जैन मंदिर से निकाली गयी। जो कि किरीमौहल्ला से होती हुई जैन भवन पहुंची एवं गोद भराई की गयी। इस अवसर पर श्री सकल दि. जैन समाज के पदाधिकारियों ने सभी का सम्मान किया। एवं आचार्यश्री और मुनि श्री ने आशीर्वाद प्रदान किया। उधर नेमावर तीर्थ पर संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के पास जैन मिलन के सैकड़ों की संख्या में कार्यकर्ता वस एवं चार पहिया वाहनों से पहुंचे। एवं गुरूदेव से एवं मुनिसंघ से आशीर्वाद लिया। जैन मिलन विदिशा की टीम ने आचार्य गुरूदेव का आशीर्वाद लेंने के लिये पधारे समस्त श्रद्धालुओं को नाश्ता एवं चाय की व्यवस्था कार्यक्रम स्थल पर की।

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