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शारीरिक – मानसिक- वेदनाओं को पर्वत की तरह सहना: हेमंत मुनि जी म सा


 अहिंसा क्रांति


बालोद।  29 सितंबर समता भवन बालोद में प्रवचन सभा में शासन दीपक श्री हेमंत मुनि जी मसा ने फरमाया कि व्यक्ति के ऊपर जब दुख हावी हो जाता है , दुखों के संताप से बड़ा परेशान होता है तब किसकी शरण में जाओ यह प्रश्न उठता है ?  अनंत काल से दुखों से बचने के लिए आत्मा कईयों की शरण ले चुका है लेकिन सुख- चैन नहीं मिला ! संसार के सागर में  कोई शरण नहीं देने वाला है,  व्यक्ति सोचता है की ‘डूबते को तिनके का सहारा ‘,लेकिन बताइए कभी तिनके ने बचाया है क्या ? संसार के जन्म मरण के वेग में अगर कोई है तो अपने से कमजोर व्यक्ति  का साथ  कभी नही लिया जाता है ! आसरा यदि लेना हो तो बलवान की शरण में जाए तो हम रक्षित होंगे , ताकतवर को दुनिया सलाम करती है जिस प्रकार अमेरिकन राष्ट्रपति ट्रंप भी अब मोदी से दोस्ती चाहते हैं! 

तीर्थंकर देव सबसे ताकतवर है , जिनवाणी का उद्घोष होता है तो सारी कठिनाईयां दूर हो जाते हैं, व्यक्ति को जिनवाणी ही पार करा सकती है ! मुनि श्री ने आगे कहा कि साधक को साधना के क्षेत्र में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है , साधक निर्भिक बनने के लिए असभ्य , अज्ञानी लोगों के मध्य ना रहे!  साधक तुम सारी कठिनाइयों में अडिग रहना , आक्रोश युक्त शब्द शारीरिक – मानसिक और वेदनाओं को पर्वत की भांति सहना , जो पर्वत कभी भी तूफानों से हिला नहीं करते मन को पर्वत की तरह बना देना ! यदि इस तरह का बन गया तो कोई भी प्रतिकारों को स्थान नहीं दिला सकता !  हर पल चित्त को प्रसन्नता से सरोकार रखना,  साधना से विचलित नहीं कर सकती हमारा मन हमेशा प्रसन्न रहेगा !

सामान्य लोगों की चित्त छोटी-छोटी बातों से भयभीत हो जाता है,  भय ने संस्कारों को दबा दिया जिसने भय को अपने जीवन में स्थान दिया वह सफलता की सीढ़ियां कभी नहीं चढ सकता ! आज प्राय: व्यक्ति भय को ही जीवन बना लिया है ! अाचार्य नानेश का चिन्तन है कि जो व्यक्ति संकल्प व पुरुषार्थ इन दोनों को आत्मा में संयोजन हो जाता है तो भय नहीं रहता ! जब आत्मा में अज्ञानता नष्ट होती है तब व्यक्ति निर्भय बनता है ! भयभीत व्यक्तियों की चाह होती है निर्भय व्यक्ति की नहीं , जहां चाह शुरू होगी वैसे ही भय शुरू हो जाता है , अभ्यास कीजिए भय से रहित बनने के लिए ! व्यक्ति समस्या से नहीं भय से मरता है!  व्यक्ति को सिद्धांतों की पकड़ होनी चाहिए सिद्धांत 3 काल में सदा वही रहेगा, व्यवहार बदल सकता है लेकिन सिद्धांत नहीं ! सेवाभावी संत श्री हर्षित मुनि जी मसा ने कहा कि शिष्य गुरु के भार हल्का करने का कार्य करें ! आज शारीरिक चिंता से ज्यादा दुख मानसिक चिंता सताती है , वैज्ञानिकों ने शारीरिक चिंता की दवा भले ही खोज ली हो लेकिन मानसिक चिंता के लिए नहीं! 

इसका इलाज स्वयं व्यक्ति को ही खोजनी पड़ती है , व्यक्ति को जो प्रिय है,जो शारीरिक समाधि दे, ऐसा हम यदि मानसिक समाधि उत्पन्न कराते हैं तो पुण्य कार्य है ! संघ सेवक का सबसे प्रमुख गुण वाणी हैं,  वाणी मूलभूत तत्व है ! बुद्धि विकास भले ना हो कम से कम वचन वाणी संभाल कर रखे!  ऐसा शिष्य ध्यान रखें ! संघ के सदस्यों भी वाणी पर नियंत्रण रखें , व्यक्ति आत्मिक गुणों को जल्द छोड़ देते हैं,  प्रकृति का भी नियम है मधुरवाणी के सामने  घुटने टेकना ही होगा ! हम अपनी समता कभी नही खोएं,  वाणी की मधुरता व व्यवहार के साथ बोला शब्द एक बार जरूर लगेगा ! कटु वचन का त्याग – बाहर का संग्रह पाप की ओर ले जाता है ! संघ व जिनशासन के कार्य व्यक्ति को ऋण से मुक्त कराते हैं! मुनि श्री ने आगे कहा कि शिष्य अन्य शिष्यों को भी शिक्षित करता है तो वह भी गुरु के भार को हल्का करने वाला होता है ! आचार्य अपने ऋणों से उऋण. होते हैं , अपने शिष्य तक पहुंचाते हैं “पढ़ाते हुए ही पढता है व्यक्ति “!  गुरु का विकास भी शिष्य पर निर्भर है . शिष्य का कर्तव्य है गुरु भाई को ज्ञान सिखाना ! साधना समूह में होकर की जाती है, एकांत में अवगुणों को पहचान नहीं पाता व्यक्ति ! वास्तविक साधना समूह में रहकर की जाती है ! यदि व्यक्ति कार्य करेगा तो निश्चित ही मानिये उस पर टीका टिप्पणी और निंदा होगी!  हर कार्य को करने का तरीका होता है आगे- पीछे वाली दौड (रेस ) व्यक्तियों के भीतर चलती ही रहेगी !

ज्ञान के क्षेत्र में कभी नहीं देखे ! व्यक्ति को यदि दूसरे  को अधिकार देने का वक्त आए तो सरलता और सहजता पूर्वक देना चाहिए , अगला व्यक्ति आपका ऋणी रहेगा , कोशिश करें  कि व्यक्ति मेरे से और आगे बढ़े!  यह सोचे कि शिक्षित करते वक्त मैंने कोई उस पर एहसान उपकार नहीं किया , संघ शासन में ऐसा नहीं होता ! संघ शासन में ऐसा  नहीं होता हैं !

आप बताएं कि व्यक्ति शरीर ,परिवार , शासन सेवा इनमें से ज्यादा वक्त किस पर बिताता है ? उपस्थित सभा में लोगों ने कहा परिवार ! मुनि श्री ने कहा व्यक्ति शासन की प्रभावना अधिक से अधिक करें शासन का कोई भी कार्य मिले तो उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए ! कार्य करते वक्त सोचे कि निश्चित ही टिप्पणी होगी ! संघ व शासन की सेवा करने से पहले आकलन करें कि पहले की तुलना में स्वभाव कैसा था? ये सोचे कि अब कैसा है !  कार्य करने के उपरांत इस पर अपना चिंतन करें , निंदा सुनकर डरे नहीं! बालोद चातुर्मास का पांचवा मासखमण पूर्णमुनि श्री की प्रेरणा से इस चातुर्मास का पांचवा मासखमण श्रीमती चंदा देवी चिप्पड धर्म सहायिका नेमीचंद चिप्पढ ने पूर्ण किया! सभा का सफल संचालन मेघा पारख , कु़ गरिमा नाहर , सोनल बुरड ने किया ! उक्त जानकारी प्रदीप चोपड़ा बालोद छत्तीसगढ़ ने दी।

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