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विवेक रूपी नेत्र को करें जागृत : आचार्य महाश्रमण

अहिंसा क्रांति न्यूज़ / राजेन्द्र बोथरा

हैदराबाद। तीर्थंकर भगवान के प्रतिनिधि, जन-जन के अज्ञान रूपी अंधकार को हरने वाले, अध्यात्म जगत के महासूर्य, ज्योतिचरण आचार्य श्री महाश्रमण ने कल्पतरु सभागार में श्रद्धालुओं को प्रवचन फरमाते हुए कहा – जैन आगम ठाणं में नक्षत्रों से संबंधित उल्लेख प्राप्त होता है जो देव जगत से संबंधित है। अभिजीत आदि सात नक्षत्र पूर्व द्वार वाले होते हैं वहीं अश्विनी, भरणी आदि सात नक्षत्र दक्षिण द्वार वाले होते हैं। पुष्य आदि सात नक्षत्र पश्चिम द्वार वाले होते और स्वाति आदि सात नक्षत्र उत्तर द्वार वाले होते हैं। यूं अठाईस नक्षत्रों का सात – सात करके उल्लेख प्राप्त होता है। जैन विद्या में देवताओं के चार प्रकारों में से ज्योतिष्क देव एक प्रकार है।

इसमें सूर्य, चंद्र, ग्रह, नक्षत्र, तारा आ जाते हैं। ज्योति यानि प्रकाश। प्रकाश का बड़ा महत्व है। सूर्य उदित होता है तो कितने-कितने कार्य किए जाते हैं, गमनागमन किया जाता है और वहीं अंधकार हो, अमावस्या जैसी रात हो तो कार्य कठिन हो जाता है। अंधकार का महत्व भी है परंतु उससे अधिक सूर्य का महत्व है। प्रकाश करने वाले का महत्व है। सूर्य नहीं तो प्रकाश करने वाले अन्य भी पदार्थ है। सारा बाहर का प्रकाश है। पर किसी के आंख नहीं तो यह प्रकाश क्या काम का। आंखें हो तो प्रकाश का महत्व है उसके लिए। सबके पास चक्षुइंद्रिय नहीं होती। केवल पंचेन्द्रिय प्राणी एवं चतुरिन्द्रिय के पास ही चक्षु है। इसीलिए शास्त्रों में कहा गया चक्षु दाता को नमस्कार तीर्थंकरों को नमस्कार। वें ज्ञान चक्षु प्रदान करने वाले होते हैं। गुरु भी अज्ञान रूपी तिमिर को हरने का कार्य करते हैं, ज्ञान रूपी श्लाका से ज्योति प्रदान करते हैं।


महातपस्वी गुरुदेव ने आगे कहा कि – भीतर की आंख भी आत्म कल्याण के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। निर्मल विवेक रूपी चक्षु होना बहुत जरूरी है। किसी के पास वह नहीं तो कहा गया वह कम से कम किसी विवेकी के साथ रहे उसकी बात सुने। किसी के पास खुद का विवेक नहीं और वह दूसरों की भी नहीं सुनता वह अपमार्ग की ओर चला जाता है, गलत मार्ग पर चला जाता है। अविवेक अज्ञान का आधार होता है उसे मिटाने का कार्य करने वाले बड़ा उपकार करने वाले होते हैं। हमने पूज्य गुरुदेव तुलसी को देखा आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी को देखा। कितनी – कितनी यात्राएं की। यहां हैदराबाद भी 50 वर्ष पूर्व आए।

दक्षिण, पूर्वांचल आदि क्षेत्रों में उन्होंने भी यात्रा कर लोगो के विवेक नेत्र जगाने का कार्य किया, जागृति लाने का कार्य किया। व्यक्ति को अपने कर्तव्य – अकर्तव्य का ज्ञान होना बहुत जरूरी है। जिसे यह विवेक नहीं क्या करना क्या नहीं करना वह एक तरह से पशु के समान है। एक संस्कृत श्लोक का अर्थ करते हुए गुरुदेव ने कहा पशु और मनुष्य में कई चीजें समान हो सकती हैं परंतु विवेक और धर्म का भेद ऐसा है जो सिर्फ मनुष्य कर सकता हैं। पशु में उतनी क्षमता नहीं जितनी मनुष्य में हैं। हमें शास्त्रों से जो ज्ञान की बात प्राप्त होती है उस पर मनन, चिंतन करें और कल्याण मार्ग पर चलें यह काम्य है।
अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण के पावन सानिध्य में कल दिनांक 26 सितंबर से अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह का शुभारंभ हो रहा है। जिसके तहत सप्ताह भर में चित्रकला, निबंध प्रतियोगिता आदि विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा।

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