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मारनेवाला और मरनेवाले के बीच वैर उत्पन्न हो जाता है : आचार्य श्री भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर। श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य विजय भव्यदर्शन सूरीश्वरजी म. ने धर्म संदेश में बताया कि –  सात व्यसनों में दूसरे नंबर में आता है – मांस । पंचेन्द्रिय मानव अथवा जानवर का मांस । कोई भी धर्म मांसाहार की इजाजत नहीं देता है । मजहब के कोई भी स्थापकों ने यह चीज खाने की अनुमति नहीं दी है । पीछे होनेवाले धर्मानुयायीओंने अपनी रसलपरता के कारण छूट ले ली हो या खाने लगे हो वह बात अलग है । धर्म के नाम ऐसा व्यवहार करना वो धर्म के खिलाफ़ है । धर्म के नाम पर अधर्म की प्रवृत्ति हैं ।

बिना हिंसा मांस मिलता है क्यां ? हिंसा कौनसे धर्म को, धर्म के स्थापक को मान्य है ? हरएक धर्मने हिंसा को पाप ही करार दिया है । जहां धर्मने संदेश दिया है कि – किसी का दिल को भी मत दुभाना.. किसी के दिलको मत जलाना – दुःखी न करना । जब दिल (जो शरीर का एक हिस्सा है) को जलाने की मनाई फरमाई हो तो पूरे शरीर को खत्म करने की, जान से ढेर करने की, प्राण छीनने की संमति कैसे देंगे ? हरगीज़ नहीं देंगे ।मांस कोई पेड़-पौधों की पैदाश नहीं है । पांच इन्द्रियां एवं मनवाले जानवर या मानव के शरीर का एक भाग है । प्राणी को मौत के हवाले करने पर मांस प्राप्त होता है । जब जीव का मांस लेने के लिए उसको काटते है तब उन जीवों के मुंह से वेदना-पीड़ा के कारण भयंकर चीखें नीकलती है । मारनेवाले का हृदय का परिणाम पत्थर के भांति कठिन-कठोर और बेहया हो जाता है ।

मारनेवाला और मरनेवाले के बीच वैर उत्पन्न हो जाता है । उस वैर के कारण कई जन्मों तक दुश्मनी चलती है ।मांस तामसी आहार होने के कारण खानेवाले का स्वभाव भी तामसी हो जाता है । सात्त्विक भाव उनसे दूर रहते है । तामसभाव में धर्म आता था टिकता नहीं है । तामस भाव से धर्मको कभी मित्रता संभवित नहीं है । दूसरे का मांस खानेवाले को पूछो, अगर आपका मांस कोई मांगे तो देने के लिए आप तैयार हो क्यां ? स्पष्ट रूप से वो मना कर देगा । दूसरे जीव का मांस लेने का अधिकार आपको कौन देता है ? बिना अधिकार, बिना संमति किसीका भी जान लेना या मांस खाना गुनाह नहीं होता क्या ? जैनशास्त्रों के मुताबिक तो वह जीवअदत्त नाम का चोरी का पाप कहलाता है ।मांस में, प्राणी के मौत के बाद 48 मिनट में असंख्य जीवों की उत्पत्ति हो जाती है । उन जीवों का भी पाप जीव को मारने वाले को और मांस खानेवाले को लगता है ।

जीवोत्पत्ति के कारण वो सड़ता भी है, इसी कारण तो ज्यादा समय जाने पर उस में से बदबू नीकलने लगती है । ऐसी सड़ी हुई चीज खाने से स्वास्थ्य को भी हानि होती है । सब कुछ है लेकिन अपना शरीर ही स्वस्थ नहीं है तो क्या करोंगे ? रसवंती कितनी भी हो लेकिन खानेवाला ही नहीं है तो क्या कामकी ?विज्ञान की माने तो मानव के आंते 32 फीट के होते है, सावज आदि की आंते 8 फीट की होती है । अनाज जितनी आसानी से हज़म होता है, उतना मांस आसानी से हज़म नहीं होता है । 8 फीट की आंते और उन जीवों के शरीर की गमी आदि के कारण वे वन्यजीव मांस को पचासकते है अपितु मानव शरीर मांस को नहीं पचा सकता है । ताकत की दृष्टि से सोचो तो भी मांस से ज्यादा ताकत देनेवाला अनाज-धान्य है । उसमें भी दलहन में जो प्रोटीन वगैरह है, उतना भी प्रोटीन आदि मांस में नहीं है । अतः मांस-अंडे आदि का सेवन नहीं करना चाहिए । (क्रमशः)

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