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मानव देह ईश्वर साधना करने व परमात्मा बनने के लिए :- गुरूमाँ विंध्यश्री

अहिंसा क्रांति/ रोहित छाबड़ा

मानव देह ईश्वर साधना करने व परमात्मा बनने के लिए :- गुरूमाँ विंध्यश्री

डीमापुर।। महावीर भवन में ससंघ विराजमान परम पूज्य गुरूमाँ 105 विन्ध्यश्री माताजी ने आज जीवन का सार क्या है पर चर्चा करते हुए कहा कि यह मनुष्य जीवन बहुत ही दुर्लभ है। यह नर से नारायण बनने के लिए प्राप्त हुआ है। मगर भौतिकता की चकाचौंध, शक्ति व सत्ता की दौड़ में आदमी इस तरह अंधा हो जाता है कि फिर उसे अपना स्वरूप दिखाई नहीं देता। जीवन का सार क्या है? सत्य क्या है? उसका बोध नहीं रहता। वह दिन-रात अर्थ की प्रबल दौङ में, आपाधापी में अपने मूल्यवान जीवन को अर्थ हीन गंवा बैठता है।

पूज्य गुरूमाँ ने क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि संसार की आपाधापी में ही अगर अपने को गंवा दिया, तो इस मनुष्य जीवन को पाने का सार क्या है? मनुष्य खाली हाथ पैदा होता है और खाली हाथ ही मर जाता है। लेकिन कुछ है जो खाली हाथ पैदा होते हैं और भरे हाथ मृत्यु को प्राप्त होते हैं। जितने भी तीर्थंकर हुए, मोक्ष गये, वे सब आये तो तुम्हारी तरह ही थे, लेकिन जाते समय सम्राट की तरह गये। उन्होंने जीवन का उपयोग* कर लिया, उन्होंने जीवन की धारा का नियोजन* कर लिया, उन्होंने जीवन की ऊर्जा का सृजनात्मक उपयोग कर लिया। उन्होंने हाल ही में समाधिस्थ मुनि चिन्मय सागर जी महाराज की उत्कृष्ट समाधि का उदाहरण देते हुए कहा कि किस तरह उन्होंने अपने जीवन की ऊर्जा का सृजनात्मक उपयोग किया।

उन्होंने जोर देकर कहा कि तुम अपने जीवन की ऊर्जा को मात्र क्रिया काण्ड में नहीं, समाधि में लगा लेना। मानव देह ईश्वर साधना के लिए मिली है; परमात्मा बनने के लिए मिली है। अतः परमात्मा की राह पर चलना- जीवन कृतार्थ हो जाएगा। इस मुश्किल से प्राप्त जीवन को समझ लेना, अपने जीवन का सम्यक् उपयोग कर लेना, अपने जीवन को भगवत्ता प्राप्ति में लगा देना। जीवन का सार क्या है? जीवन का सत्य क्या है? समझ लेना और उसी के फल स्वरूप अपने जीवन को आयाम देना-तभी तुम्हारा श्रम सार्थक होगा; तभी तुम्हारा श्रम सृजनात्मक होगा; तभी तुम्हारा जीवन सम्यक् होगा। इसके लिए जागरण की जरूरत है। मात्र क्रिया काण्ड और तेरा-मेरा में ही उलझ गये तो जीवन व्यर्थ चला जायेंगा।

उन्होंने कहा-यह मनुष्य जीवन, तुम्हें अपने पापों का प्रक्षालन करने के लिए, पापों से मुक्त होने के लिए, अपनी आत्मा का उत्थान करने के लिए ही 84 लाख योनियों से भटकते-भटकते बहुत ही पुण्योदय से प्राप्त हुआ है। परमात्मा बनने के लिए ही तुम्हें यह नर भव मिला है क्योंकि तुम्हारी नियति ही परमात्मा बनना है और मुक्ति मनुष्य जीवन से ही संभव है।

अतः इस नर भव को नारायण बनने का सुअवसर जो प्राप्त हुआ है, इसे ऐसे ही मत खो देना। उन्होंने अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि इस नर भव से अभी भी अगर भीतर प्रकाश नहीं हुआ, अभी भी सूरज न उगा तो सारा ही जीवन अंधेरे में होम हो जाएगा। अतः धर्म की नगरी में पुण्य प्राप्त कर अपने जीवन को उच्च बनाकर सफल कर लेना; धर्म को अपने जीवन का हिस्सा बना लेना; प्राप्त हुये इस अनमोल रत्न से शाश्वत संपदा प्राप्त कर लेना- यही जीवन का सार है।

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