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भीतर में सहिष्णुता का भाव रखे : आचार्य महाश्रमण

AHINSA KRANTI NEWS / RAJENDRA BOTHRA

हैदराबाद। जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता , शांतिदूत, आचार्य महाश्रमण जी का शमशाबाद स्थित महाश्रमण वाटिका में सानंद चातुर्मास प्रवर्धमान है। प्रतिदिन आचार्यवर की पावन देशना से केवल हैदराबाद के ही नहीं अपितु देशभर से श्रद्धालुजन वर्चुअल रूप से लाभान्वित हो रहे हैं। आज रविवारिय मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के अंतर्गत “पारिवारिक शांति के सूत्र” विषय पर उद्बोधन प्रदान करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी ने कहा – जीवन में अगर आत्मा की शांति के सूत्र मिल जाए तो पारिवारिक शांति में भी योगदान हो सकता है। आदमी आत्मा में शांति, समता का भाव रखें।

जीवन में विभिन्न परिस्थितियां आती है। कभी ऊंची – नीची, सम – विषम दोनों तरह की स्थितियां हो सकती है। भले मन के प्रतिकूल हो अथवा मनोकुल स्थिति आदमी समता का भाव रखें। मानों वाटरप्रूफ की तरह हो जाए। कैसी भी परिस्थिति में व्यक्ति पर कोई असर नहीं हो, शांति रहें, समता रहें। अवांछनीय असर मन पर न हो। समता ऐसा सूत्र है, शांति, मैत्री ऐसा सूत्र है जिससे परिवार में शांति रह सकती है उससे भी पहले आत्मा में शांति रह सकती है। कई बार दूसरों को शांत करना संभव नहीं होता तो व्यक्ति स्वयं तो शांत रहें, खुद अपनी शांति में रहे। परिवार में छोटे – बड़े सभी सदस्य रहते हैं भीतर में सहिष्णुता का भाव रहे।

पूज्यप्रवर ने आगे फरमाया कि साधु के लिए कहा जाता है कि वह पृथ्वी के समान सहने वाला हो। गृहस्थ को भी थोड़ा सहने वाला होना चाहिए। कोई कहे की परिस्थिति को अपने अनुकूल नहीं बना सकते तो खुद उसके अनुरूप बन जाओ। इस बात को मैं ठीक नहीं मानता क्योंकि जिस बात को मैं ठीक नहीं मानता वैसा कैसे बन जाऊं। वो न भी हो पर सहिष्णुता ऐसा तत्व है जो व्यक्ति परिवार सबके लिए अच्छा है। कई बार व्यक्ति गुस्से में नहीं बोलने वाली बात भी गलत समय पर बोल जाता है। मेरा परिवार के लिए छोटा सा फार्मूला है – सहना चाहिए, मौके पर कहना चाहिए और शांति से रहना चाहिए। मुखिया को तो और सहिष्णुता रखनी पड़ सकती है। बड़े अगर आपा खो दें तो परिवार पता नहीं कब टूट जाए। आचार्य श्री ने प्रेरित करते हुए कहा कि सप्ताह में एक समय सारा परिवार एकत्रित होकर सामायिक अर्हत वंदना आदि धार्मिक क्रिया करने का प्रयास करें। फिर प्रेरणा, शिक्षा का भी क्रम चल सकता है। सामायिक भी परिवार मैं सिंचन देने वाली बन सकती है। व्यक्ति स्वार्थ भाव से दूर रहकर सहिष्णुता का भाव भीतर में रखें, यह काम्य है।
इससे पूर्व गुरुदेव ने ठाणं सुत्र से चतुर्थ निन्हव समुच्छेद का विवेचन किया। साध्वीप्रमुखा श्री कनकप्रभा जी ने भी संस्मरणों के माध्यम से प्रेरणा पाथेय प्रदान किया।

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