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भारत की नीतियां कभी आकृमण की नहीं रही : मुनि श्री समता सागर

अहिंसा क्रांति / ब्यूरो चीफ देवांश जैन

विदिशा(भद्दलपुर) – निमित्त मिलते है, उसी हिसाब से प्रश्न उठा करते है, यह वाट्सएप और इन्टरनेट का जमाना है, यदि आप लोगों से सीधे सीधे प्रश्नों को पूछ लिया जाऐ तो कोई भी उत्तर दे देगा लेकिन वही वात थोड़े घुमा कर पूंछी जाती है, तो अच्छे अच्छे लोगों का दिमाग चकरा जाता है, एकदम तो उत्तर देते ही नहीं वनता है। उपरोक्त उदगार मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने शीतलधाम पर प्रातःप्रवचन सभा को ओन लाईन सम्वोधित करते हुये व्यक्त किये।

उन्होंने कहा कि जैसे हवा चलती है, उस अनुसार वादलों की गति हो जाती है,ठीक उसी प्रकार भव्य जीवों के पुण्य के योग से भगवान के समवसरण भी लगा करते है। जैसे कुछ लोग कहते है, कि कुछ क्षेत्र ऐसै है जंहा पर आचार्य श्री के कई चातुर्मास हो गये और कई स्थान ऐसे है कि वंहा पर आचार्य श्री जाना तक नहीं हो पा रहा, उन्होंने कहा कि तीर्थंकरों का निमित्त भी वंहा पर रहने वाले भव्य जीवों के निमित्त से भी मिला करता है।

उन्होंने कहा कि प्रश्नमंच तो आजकलवाट्सएप पर शोसल मीडिया वहूत चल रहे है,उसका जबाव भी आप लोग रोजाना दे रहे हो ,कुछ प्रश्नों को यदि सीधे सीधे पूंछा जाऐ तो उसका उत्तर कोई भी दे देगा लेकिन कभी कभी गुगली भी तो फैकना पड़ती है, थोड़ा सा प्रश्नों को घुमाकर पूछने से अच्छे अच्छे स्वाध्यायी भी चकरा जाते है।सागर वाले भी वैठे है,और यदी सागर वालों से ही पूंछ लिया जाऐ वताओ सागर में गुरूदेव का कितनी वार प्रवास हुआ? तो स्थानीय लोग भी एकदम न वता पाऐंगे।

और फिर जो उत्तर निकल कर आते है, वह लोगों की स्मृति में सदैव अंकित हो जाती है। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री को पहले कई वार सागर वुलाया लेकिन वह सागर नहीं पहुंचपाऐ लेकिन जव निमित्त मिला तो ऐसा मिला कि एक सागर की शुरुआत कुछ ऐसी हुई कि फिर सागर ही सागर मिलते चले गये और आचार्य गुरूदेव भी फिर कितनी वार पहुंचे कि उसकी भी कोई गिनती नहीं।

मुनि श्री ने कहा कि भगवान का समवसरण भी  पुण्यात्माओं के नियोग से ही लगा करता है। उन्होंने  वर्तमान कोरोना काल की चर्चा करते हुये कहा कि यदी यह समय का वातावरण नहीं होता तो जंहा पर चातुर्मास होते है वंहा पर आप सभी लोगों का आवागमन होता रहता है।

लेकिन समयानुसार जो छोटी छोटी संयोजनाऐं चल रही है, और कार्यकर्ता अपनी महनत कर रहे है, तो वह छोटी छोटी संयोजनाओं ने कई वड़े वड़े कार्य कर दिये है। शुरुआत शांतिधारा की हुई थी लेकिन आपलोगों के उत्साह ने उसे विस्तार का रुप प्रदान कर दिया है। उन्होंने कहा कि ये सभी कार्य धर्म की प्रभावना के होते है, और इसका पुण्य भी खूव मिला करता है।

उन्होंने भारत की नीतियों की चर्चा करते हुये कहा कि भारत की नीतियां कभी आकृमण की नहीं रही लेकिन यदि कोई हम पर आकृमण करे तो फिर हमारी नीति भी प्रतिकृमण की नहीं रहती। और हमारा धार्मिक इतिहास इस वात का गवाह है, भारत की नीति जंहा कर्म पर विश्वास करती है, तो वंही वह भाग्य पर भरोसा करता है,

उन्होंने कहा कि अंदर के कर्म तो वाद में वनते है, पहले वाहर का विस्तार करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि प्रच्छना भी एक स्वाध्याय के क्रम में आता है, सभी लोग वड़े वड़े ग्रन्थों को नहीं पड़ पाते है,तो उनके लिये इस प्रकार से प्रवचनों के माध्यम और प्रश्नोत्तरी जैसे छोटे छोटे प्रकल्प भी लाभकारी सिद्ध हो रहे है।

उन्होंने कहा कि ज्यादा हो हल्ला भी नहीं, जो लोग भी यंहा पर आ रहे है उन सभी को नियमावली के अनुसार ही आना है। हम सभी की कार्ययोजना चुस्त एवं दुरुस्त और सुव्यवस्थित है, जिनवाणी और जिनेन्द्र देव की प्रभावना के उद्देश्य से यह शांतिधारा का कार्यक्रम चल ही रहा है। चातुर्मास कमेटी और  कार्यकर्ताओं के द्वारा जो भी संयोजना शुरु हुई उसका विस्तार हेतू आशीर्वाद मांगा गया है।

 उन्होंने कल के दो प्रश्नों का समाधान करते हुये कहा कि श्री सिद्धक्षेत्र सोनागिर जी में आठवे तीर्थंकर श्री चंद्रप्रभु भगवान का समवसरण आया एवं आचार्य श्री ने सन्१९८८ में मुनि श्री प्रमाण सागर आदि 8 मुनिओं को दीक्षा प्रदान की थी,एवं इसी क्रम में.. श्री शीतलधाम भद्दलपुर विदिशा में भगवान श्री शीतलनाथ स्वामी के गर्भ जन्म तप और ज्ञान कल्याणक हुये है,

वर्तमान का विदिशा तो वहूत छोटा है, भद्दिलपुर तो वहूत वड़ा नगर था शीतलनाथ भगवान का समवसरण यंहा पर लगा एवं 2014 में आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने यंहा फर चातुर्मास में चार मुनि दीक्षाएं मुनि श्री शीतलसागर जी आदि को प्रदान की थी उपरोक्त दौनों उत्तर को मान्य किये जाते है।

मुनि श्री ने दूसरे प्रश्न के संद्रभ में वताया कि1985 श्री सिद्धक्षेत्र नैनागिर जी से आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के आशीर्वाद से पृथक विहार मुनि श्री योगसागर जी, मुनि श्री क्षमासागर जी मुनि श्री गुप्ती सागर जी का नैनागिर से सागर के लिये हुआ था।

प्रवक्ता अविनाश जैन ने जानकारी देते हुये वताया कि  मुनि श्री ने30 सितंबर 2020 के लिये दो नये प्रश्न…दिये। जिसमें प्रथम प्रश्न आचार्य कुंद कुंद स्वामी के कितने नाम थे और वक्रगीव नाम उनका क्यू पड़ा? दूसरा प्रश्न है, दक्षिण भारत की राजघराने से सम्वंधित एक श्राविका थी जिन्होंने धर्म के क्षेत्र मेंएवं मुनिसंघों के लिये महत्वपूर्ण कार्य किये एवं उनके नाम से एक पुस्तिका भी प्रकाशित की गई। उनका नाम एवं  कर्नाटक में उनको कौन सी उपाधि प्रदान की गई। उपरोक्त प्रश्नों का जबाव 30 सितं को प्रातःप्रवचन सभा मे किया जाऐगा।

~ब्यूरो चीफ देवांश जैन (विदिशा) मध्यप्रदेश

श्री १००८ शीतलनाथ भगवान के ४ कल्याणक से सुशोभित भूमि भद्दलपुर(विदिशा) स्थित निर्माणधीन समोशरण मंदिर
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