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बिना गुरु-बिना जानकारी ध्यान के विषय में आगे न बढ़े : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर । दि. 27 सितम्बर 2020 श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य विजय भव्यदर्शन सूरीश्वरजी म. ने धर्म संदेश में बताया कि –  ऋषि-भाषित सूत्र में कहा है – शरीर में जो स्थान मस्तक का है, वृक्ष में उसकी जड़ का जो महत्त्वपूर्ण स्थान है, उसी प्रकार अध्यात्म की साधना में ध्यान का प्रमुख स्थान है । हाँ, जैनधर्म की एक भी क्रिया ऐसी नहीं है, जिस में ध्यान न हो, ध्यान को जगह न दी हो । सामायिक-प्रतिक्रमण का काउस्सग्ग-पूजा-स्वाघ्याय आदि सभी क्रियाओं में ध्यान को स्थान दिया है । इतना ही नहीं महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है । बारह प्रकार के तपों में भी ध्यान को स्थान है और सबसे तेज कर्म खपाने का साधन करारा है ।

ध्यान का अग्नि ऐसा जलता है कि चंद ही क्षणों में लाखों-करोड़ो जन्मों के कर्म की उस में आहुति हो जाती हैं । ध्यान का मतलब है चलती क्रिया में मन का एकाग्र होना । जब मन ही भटकता है तो ध्यान कैसे होगा ? हरएक क्रिया में मन की हाज़री आवश्यक और अनिवार्य है । अलबत्ता, मन चपल-चंचल है । उसको बारबार बिठ़ाना पड़ता है । वो बार-बार भागता रहता है । अच्छे-अच्छे योगीजनों को भी इस कार्य के लिए काफी परिश्रम उठ़ाना पड़ता है ।वचन और काया की हरएक प्रवृत्ति का जन्म सबसे पहले मन में होता है । वो प्रवृत्ति पुण्य की हो, या पाप की । पाप प्रवृत्ति के लिए तैयार हुए मन को दबाना है । बस में रखना है । वचन और काया से ज्यादा निगरानी की जरूरत मन के ऊपर रखना होगा । क्योंकि मन ही वचन-काया को प्रेरणा देता रहता है । वचन और काया की प्रवृत्ति में ज्यादा समय लगता है । जबकि मन शीघ्र गति से भागता रहता है ।जैन शास्त्रों में ध्यान के विषय में बहुत साहित्य मिलता है ।

हरएक गुणस्थानक की दृष्टि से किसको कौनसा-कैसा ध्यान होता है ?  उसकी जानकारी हमें आचार्य रत्नशेखरसूरिजी म. रचित गुणस्थान क्रमारोह ग्रंथ में प्राप्त होती है । ध्यान के प्रकार, हरएक ध्यान के लक्षण, ध्यान से गति, ध्यान का विषय-वस्तु, ध्यान के अधिकारी वगैरह की विस्तृत जानकारी के लिए आपको ‘ध्यानशतक’ नाम के ग्रंथ के ग्रंथ का अवलोकन करना होगा ।महर्षि पतंजलिने भी ध्यान की बात बताई है । योग के आठ अंगों में सातवे नंबर पे ध्यान आता है । ध्यान-साधना के लिए आगे के छह अंगो की साधना जरूरी है । यम-नियम-आहार-आसन-प्राणायाम-धारणा का ठ़िकाना न हो और आँख मुँद के ध्यान में बैठोंगे तो ध्यान नहीं होगा । काले काले सर्कल ही दिखेंगे । ध्येय तत्त्व की गहरी जानकारी भी इसके लिए अतिजरूरी है । प्रारंभिक कक्षा में बिना आलंबन ध्यान नहीं होता । अतः छट्ठे गुणस्थानक तक सालंबन ध्यान है । उसके बाद आगे की कक्षा में निरालंबन ध्यान आता है ।ध्यान के मुख्यतया चार प्रकार है । 1.आर्तध्यान 2.रौद्रध्यान 3.धर्मध्यान 4.शुक्लध्यान । पहले दो प्रकार के ध्यान अशुभ है, जबकि 3-4 नंबर के ध्यान शुभ है । ये चारों ध्यान के उपप्रकार – उपविभाग भी 4-4 है । ज्यादा जानकारी के लिए ध्यानशतक-योगशास्त्र वगैरह ग्रंथोंके अवलोकन या इस विषय के ज्ञाता के पास जा सकते है । बिना गुरु-बिना जानकारी ध्यान के विषय में आगे न बड़ें । बाकी ध्यान का हुताशन जलने पर सारे कर्म भी नष्ट हो जातें हैं ।-

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