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बंगाईगांव (असम) में श्रद्धा-भक्ति के अष्टद्रव्य पूजन के साथ मनाया 13 वा आर्यिका दीक्षा दिवस समारोह :- अहिंसा क्रांती

रोहित छाबड़ा/अहिंसा क्रांती

श्रद्धा-भक्ति के अष्टद्रव्य पूजन के साथ मनाया 13 वा आर्यिका दीक्षा दिवस समारोह, आस्था की अंजुली से श्रद्धा का जल अर्पित कीया:- अहिंसा क्रांती

बंगाईगांव नगर जैन मंदिर में आयोजित समारोह में हुआ गुरुभक्ति का समागम

बंगाईगांव। श्री 1008 शांतिनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के दौरान मंगलवार, 08 अक्टूबर को बंगाईगांव नगर, बड़े बाजार शान्तिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर के प्रांगण पर 20वीं सदी के जीवन्‍त समयसार, रत्‍नत्रय त्रिवेणी के प्रयागराज, आत्‍मविद्या के महाज्ञानी, संस्‍कृति-जिनवाणी संरक्षक, महातपस्‍वी, चारित्रधर्म के युग प्रमुख, परमपूज्‍य, चारित्रचक्रवर्ती, तेज:पुंज प्रथमाचार्य श्री शांतिसागरजी महाराज की परम्‍परा के प्रथम पटटाचार्य चारित्रचूडामणि परमपूज्‍य प्रात:स्‍मरणीय आचार्य श्री वीरसागरजी मुनिराज ने चतुर्विध संघ व्‍यवस्‍था को सम्‍यक रुण प्रदान करने वाले व मुनि-आर्यिका-क्षुल्‍लक-क्षुल्लिकारूप सुदीर्घ शिष्‍य परम्‍परा को विकसित करने वाले उसी शिष्‍यपरम्‍परा की अंतिम आर्यिका शिष्‍या रहीं परम पूजनीय, गुरुमाँ गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री सुपार्श्वमती माताजी कीसुशिष्याये गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री गरिमामति माताजी, आर्यिका रत्न 105 गम्भीरमति माताजी का 13 वा संयम आर्यिका दीक्षा दिवस समारोह प्रातः 9 बजे से मनाया गया। वही दीक्षा दिवस, में आस्था का सैलाब नजर आया।

समाज के अध्यक्ष विजय रारा ने जानकारी देते हुए बताया कि पूज्य गुरुमाँ गरिमामती माताजी व गम्भीरमति माताजी ने विजय दशमी दिवस पर 13 वर्ष पूर्व जयपुर शहर के नेमी सागर कॉलोनी, वैशाली नगर में सांसारिक जीवन का त्याग कर, वैराग्य स्वरूप को धारण कर मोक्ष मार्ग की ओर प्रसस्थ होते हुए अपने जीवन वर्षो की त्याग, तप और साधना के कठोर तप कर पूज्य गुरुमाँ सुपार्श्वमती माताजी दीक्षा धारण की और आज उन्ही दीक्षार्थी शिष्या, शिष्योतमा श्रमणी गणिनी आर्यिका रत्न श्री गरिमामती माताजी गम्भीरमति माताजी का दीक्षा दिवस बंगाईगांव नगर दिगम्बर जैन मंदिर के प्रांगण पर श्रद्धा- भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। उन्होंने बताया किइस मौके पर ‘राग से वैराग्य की ओर’ के कई कार्यक्रम आयोजित हुए।

उन्होंने कहा वात्सल्य की छाया प्रत्येक शिष्य व भक्त पर निरंतर बनी रहती है,मेरा अहो भाग्य है जिसे ऐसे ज्येष्ठ व श्रेष्ठ आर्यिका गुरु के रूप में प्राप्त हुए.ऐसे गुरु जिन्होंने मुझे माँ के सामान अपने पुत्र का स्थान दिया। आज उन भारत गौरव गणनि आर्यिकारत्न सुपार्श्व मति जी माताजी के भी श्री चरणों में वन्दामि वंदन करता हूँ। जिन्होंने ऐसी महान परोपकारी शिष्य का निर्माण किया।

उन्होंने कुछ पंक्तियों के माध्यम से कहा कि यह गाथा है नारी जीवन के परम उत्‍थान की है। दृढ इच्‍छाशक्ति से अभिशाप को वरदान बनाने की है आर्यिकाश्री की जीवन झॉंकी को प्रदर्शित करती यह गाथा आपके समक्ष है-

साथ साधू का तो सार दिखाई देता है

मिटती हुई ज़िन्दगी का अधर दिखाई देता है

दिवाली और दशहरा आते है चले जाते हैं

लेकिन जहाँ साधु हों वहां हर दिन त्यौहार दिखाई देते है

उन्होंने बताया कि आर्यिकाश्री के जीवनवृत्‍त को, उनके गुणों को , उनकी महिमा को, उनके उपकारों को शब्‍दों में बॉंधना मूढता होगीा मैंने तो आर्यिकारत्न की चरण रज को पाने, उनकी वात्‍सल्‍य, करूणामयी मनभावन छवि को निहारने में, उनकी अमृत वाणी के कुछ शब्‍दों को आत्‍मसात करने की भावना के साथ अपने भावों की अभिव्‍यक्ति को शब्‍दों का रूप देने की धृष्‍टता की है। गुरू माता के प्रति अपने भावों को प्रगट करने की भावना को एक रूप देने की कोशिश की है। भूल होना अवश्‍यंभावी है। उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। पूज्‍य आर्यिकाश्री के चरणों की रज पाने की उत्‍सुकता लिए उनके चरणों में कोटि-कोटि वंदन।

प्रबंध कमेटी के प्रवक्त व संयुक्त मंत्री रोहित छाबड़ा ने बताया कि गुरू मां गाणिनी आर्यिका गरिमामति गम्भीरमति माताजी के दीक्षा महोत्सव में मंगलवार को जैन मन्दिर बंगाईगांव मे 13वे दीक्षा महोत्सव पर प्रातःकाल शांतिधारा, अभिषेक के पश्चात् गुरू मां गरिमा मति गम्भीरमति माताजी का भव्य पूजन हुआ इसके बाद मे गुरू मां का रजत कलशों से पाद पक्षालन हुआ। मंगला चरण, दीप प्रज्जवलन, विनयांजलि, शास्त्र भेंट, वस्त्र भेंट, पिच्छिका भेंट, कमण्डल भेंट, एवं उसके पश्चात् गुरू मां गरिमामति गम्भीरमति माताजी के मंगल आशीष प्रवचन होंये।समाज के प्रवक्ता रोहित छाबड़ा ने बताया कि इस मौके पर आर्यिका 105 गरिमामति व गम्भीरमति माता के प्रति अपनी सम्पूर्ण श्रद्धा व्यक्त करने आस्था की अंजुली में श्रद्धा का जल लेकर अनेक नगरों से बड़ी संख्या में यहां लोग पहुंचे। प्रवक्ता रोहित ने बताया कि वीतरागता के मार्ग पर चल पड़ने के बाद मुनि/आर्यिका के दीक्षा समारोह उनके भक्तों के लिए बड़ा महत्व का होता है। इसी क्रम में आज इसे पूरी श्रद्धा, भक्ति से मनाने के लिए जनसमुदाय यहां बंगाईगांव में उपस्थित हुआ। इसी दौरान बंगाईगांव के बाल कलाकारों ने अभूतपूर्व नृत्य करके मंगलाचरण की प्रस्तुति दी जिससे देख दर्शकों के अंदर अद्भुत ऊर्जा और जोश का अकल्पनीय संचार कर गई।

समारोह का शुभारंभ प्रातः 9 बजे संघस्थ ब्र. उर्वशी दीदी उन्नति दीदी के निर्देशन में, समाजजनों द्वारा आचार्यों के चित्र अनावरण एवं उनके संमुख दीप प्रज्वलित कर समारोह की शुरुवात की। जिसके बाद बंगाईगांव नगर दिगम्बर जैन समाज, महिला मंडल और विभिन्न जगहों से पधारे श्रेष्ठियों द्वारा माँ सुपार्श्वमती माताजी के महाअर्घ सहित ग.आ. गरिमामती माताजी-गम्भीरमति-रतनमती माताजी की 13 द्रव्यों के थाल से भजन- भक्ति के साथ गुरु पूजन आराधना की तत पश्चात् माताजी को वस्त्र भेट किये गये जिसे भेट करने का सौभाग्य स्थानीय समाज के ग़ुलाबमल दिलीप कुमार मुकेश कुमार छाबड़ा परिवार व प्रकाश चन्द बबलू कुमार राजेश कुमार मनीष कुमार बगड़ा परिवार को प्राप्त हुआ। इसके बाद समाज के विभिन्न श्रेष्ठियों द्वारा आर्यिकाद्वय को शास्त्र भेट किये गए। इसके तुरंत बद समाज के विभिन्न श्रेष्ठियों द्वारा आर्यिकाद्वय आर्यिकारत्नो के पाद प्रक्षालन हुए। इसी दौरान पीछी परिवर्तन का कार्यक्रम हुआ जिसमें गुरुभक्त परिवार ललित कुमार रोहित कुमार मोहित कुमार द्वारा आर्ययकारत्न गरिमामति माताजी को नविन पिच्छी भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और गुरुभक्त परिवार पन्ना लाल पवन कुमार अशोक कुमार सेठी द्वारा आर्ययकारत्न 105 गम्भीरमति माताजी को नविन पिच्छी भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। माताजी ने पुरानी पिच्छी निर्मला ललित ठोल्या एवम सरीता पवन सेठी को धर्म के प्रति और संतो के प्रति प्रभावना उल्लेख करते भेंट की। इस बीच विभिन्न क्षेत्रों से आये श्रेष्ठ व्यक्तियों ने पूज्य माताजी का आशीर्वाद प्राप्त किया, समाज के अध्यक्ष विजय रारा, मंत्री कमल पहाड़िया, उपाध्यक्ष सुनिल बगड़ा सलाहकार राजेश रावका व कार्ययकारणी सदस्यों सहित महिला मंडल बंगाईगांव ने सभी अतिथियों और समाज श्रेष्ठियों का स्वागत सम्मान किया। अंत में एक तरफ जहा नगरवासी धर्मामृत वर्षा में भींग रहे थे, तो दूसरी और उन्हें अपनी किशोर वय में ही आर्यिका माताजी से प्रारम्भिक धर्मज्ञान प्राप्‍त करने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ। उनके लिए पूज्य गरिमा-गम्भीरमति माताजी के प्रवचन हुए जिनमे उन्होंने कहा कि यह मेरा दीक्षा दिवस नही गुरु उपकार दिवस है।

सर्वोच्च साध्वी आर्यिका गरिमामति माताजी ने कहा कि हमें नई पीढ़ी से बहुत आशाएं हैं, क्योंकि वह काफी संस्कारवान है। उसमें उदारता के साथ-साथ करुणा भी है। धर्म के प्रति उसमें गहरी आस्था है, इसलिए हमारा विश्वास है कि जैन धर्म अक्षुण्ण रहेगा। उन्होंने बताया कि हमारी दीक्षा उनके चरणों में हुई जिन्होंने भाद्रपद शुक्‍ला षष्‍ठी वि.सं.2014 की पावनबेला में स्त्रियोचित उत्‍कृष्‍ट संयमी जीवन को गुरुदेव से अंगीाकर किया। ब्र.भंवरीबाई ने।

उन्होंने अपनी दीक्षा गुरु के बारे मे जानकारी देते हुए बताया कि गुरुमा दीक्षा के अनन्‍तर भी संघस्‍थ आर्यिका श्री इन्‍दुमति माताजी की मातृवत्‍सल अनुशासनमय पावन सन्निधि में उनका जीवन का निर्माण हुआ है। इनसे ही मातृविहिन उनके जीवन में मातृवात्‍सल्‍य मिला था।परमपूज्‍य गुरुवर्य आचार्य श्री धर्मसागरजी, परमपूज्‍य आचार्य श्री अजितसागरजी, आचार्यकल्‍प श्री श्रुतसागरजी से भी दीक्षा-शिक्षा प्राप्‍त कर उन्होंने अपना व हमारा जीवन उपकृत किया है। उन गुरुजनों का भी स्‍मरण हमें कृतज्ञता की प्रेरणा दे रहा है। हम तो उनके समक्ष बालक व्रत ही थे फिर भी विनय की प्रतिमूर्ति, धर्मवत्‍सला माताजी के निरभिमान वात्‍सल्‍यमय धर्मानुराग का अजस्रस्‍त्रोत देखकर उनकी गुरुभक्ति का सुखद अनुभव हुआ, क्‍योंकि अब श्रद्धा ज्ञान चारित्र के त्रिवेणी समंगमरूप आपका जीवन अपनी ऊचाइयों और गहराईयों को प्राप्‍त हो चुका था। उसी समय संघ के साथ आपने भी आर्यिका श्री के ज्ञानशिखर से चतुरनुयोग जिनवाणी का ‘अजस्रप्रपात’ प्रवाहित होते अनुभव किया था। अपने संयम की उज्‍ज्‍वलता ओर ज्ञान की निर्मलता से जिनशासन की तथा संघ की महती प्रभावना आपसे हुई है।आसाम, बंगाल बिहार, उडीसा, मध्‍यप्रदेश, महाराष्‍ट्र, गुजरात, राजस्‍थान, कर्नाटक आदि प्रान्‍तों में आपका मंगल विहार हुआ, जिससे सभी को धर्मामृत की प्राप्ति हुई है। मां जिनवाणी के कोषागार के अनुपम मुक्‍ता आपकी शान्‍त गम्‍भीर वाणी से जहां प्राप्‍त होते रहे वहीं आपकी ज्ञान गम्‍भीर लेखनी से कुन्‍दकुन्‍दादि आचार्य भगवन्‍तों के ग्रन्‍थों का हिन्‍दी अनुवाद भी हुआ जिससे स्‍वाध्‍याय प्रेमियों को लाभ प्राप्‍त हुआ है।अष्‍टपाहुड, आचारसार, तत्‍वार्थराजवार्तिक, तत्‍वार्थ श्‍लोकवार्तिक, प्रमेयकमलमार्तण्‍ड आराध्‍नासार, सागरधर्मामृत, सर्वार्थसिद्धि आदि न्‍याय-दर्शन-सिद्धांत-अध्‍यात्‍म विषयक वृहद एवं लघुकाय ग्रन्‍थों का अनुवाद आपने किया है। आपके उपयोग की स्थिरता विलक्षण है किसी कार्यक्रम सभा अथवा धर्मोपदेश सभा में भी प्राय: आपकी लेखनी तो चलती ही है साथ ही श्रोत्रेन्द्रिय वक्‍ताओं की बात भी सुनती रहती है। जब आपके उपदेश का अवसर आता है तो आप जिस भी वक्‍ता की जिस किसी बात का स्‍पष्‍टीकरण करना होता उसे आगम प्रमाणों के आधार पर स्‍पष्‍टीकरण करती है। पर्यूषण पर्व में जब आप तत्‍वार्थसूत्र ग्रन्‍थराज का विवेचन करती हैं तो आपके सम्‍मुख कोई ग्रन्‍थ नहीं होता फिर भी वाणी से सप्रमाण चतुरनुयोगरूप सरस्‍वती का प्रवाह बहता है उस समय ऐसा लगता है मानो साक्षात सरस्‍वती ही बोल रही हों।संयम ज्ञान की प्रतिमा आर्यिका श्री का जीवन तप तप आदि से पूरित पावन जीवन है। मन्‍दकषाय आपकी प्रशमता का प्रतीक है, देव शास्‍त्र गुरु के प्रति अटूट भक्ति तथा श्रद्धा-विनय अन्‍यत्र दुर्लभ है। धर्मात्‍मा जीवों के प्रति आपका वात्‍सल्‍य भी देखने लायक है। ऐसे अनेक गुणों से विकसित दीक्षित जीवन के वर्ष आप पूर्ण कर चुकी हैं। आज हमारी दीक्षा जयंति के इस पावन प्रसंग पर हम तो यह चिंतन करते हैं कि आपका वह संयमालोकित जीवन ही स्‍वयं ”गौरवग्रन्‍थ” है। हमारी’प्रशममूर्ति, महाप्राज्ञ’, गणिनी आर्यिका प्रमुख श्री सुपार्श्‍वमती माताजी के लिए हमारे दीक्षा दिवस अवसर पर यही पावन भावना है कि आपके संयमी जीवन का अनुपम लाभ दीर्घकाल तक धर्म और संघ प्रभावना का निमित्‍त बनता रहे।आर्यिकारत्नो द्वारा इतनी शानदार आर्यिकारत्न 105 सुपार्श्व मति की पूरी जीवन गाथा यूं चलती रही जैसे किसी थियेटर के सुप्रशिक्षित कलाकार आर्यिकारत्न श्री वीतरागी जीवन रूपी किताब के एक-एक कर हर पन्ने पलट रहे हों। उनके दीक्षा धारण से लेकर उनकी हर प्रेरणा, लिखित-रचित अनेक ग्रंथों, रचनाओं, गौशाला, प्रतिभास्थली, भाग्योदय तीर्थ, तीर्थों के जीर्णोद्धार आदि से संबंधित जानकारी दीं गई। ये जानकारीया यहां उपस्थित जन समूह को झकझोर गईं। आर्यिकारत्न सुपार्श्व मति की त्याग तपस्या से यहां कौन परिचित नहीँ था, किन्तु उनके गुणान को व्यक्त करने लिए आर्यिकारत्न गरिमामती ने जिन शब्दों का उपयोग किया वे एक-एक शब्द लोगों के अंतर्मन में सीधे उतर गये। इसे सुनने वालों में शामिल लोगों का कहना है कि ऐसा लगता है जैसे आर्यिकारत्न गरिमा मति गम्भीरमति, ने आर्यिका माता द्वारा रचित गुरु गाथा के हर पहलू को आत्मसात किया होगा, तभी वे इतना सजीव चित्रण कर सके। फिर आरती कर समारोह का समापन किया।

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