breaking news मुख्य समाचारJain NewsUncategorizedकार्यक्रमजैन प्रवचन, जैन धर्म, जैन ज्ञानजैन साधू, जैन मुनि, जैन साध्वी

बंगाईगांव (असम) में शरदपूर्णिमा के दिन जैन धर्म के दो सितारे आचार्य 108 विद्यासागरजी एवं गणनि आर्यिका 105 श्री ज्ञानमती माताजी के अवतरण दिवस पर हुआ गुणगान :- अहिंसा क्रांति

अहिंसा क्रांति/ रोहित छाबड़ा

बंगाईगांव (असम) में शरदपूर्णिमा के दिन जैन धर्म के दो सितारे आचार्य 108 विद्यासागरजी एवं गणनि आर्यिका 105 श्री ज्ञानमती माताजी के अवतरण दिवस पर हुआ गुणगान :- अहिंसा क्रांति

बंगाईगांव।। बंगाईगांव शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर परिसर में आचार्य 108 विद्यासागरजी व आर्यिका 105 श्री ज्ञानमती माताजी का अवतरण दिवस मनाया गया जिसके अंतर्गत पंडित आसुतोष ने कहा कि इतिहास गवाह है कि जब-जब इस पृथ्वी पर अत्याचार, अनाचार, दुराचार, शोषण, हिंसा, विद्वेष, अधर्म तथा कुरीतियों का बोल-बोला हुआ, तब-तब दिव्य आत्माओं ने इस धरती पर अवतार लेकर समाज में व्याप्त समस्त बुराईयों को दूर करने का बीड़ा उठाया और पीड़ित मानव की सेवा कर उन्हें धर्म के रास्ते पर लगाया। 26 सौ वर्ष पूर्व मानव जाति के जीवन में अमूलचूल बदलाव लाने हेतु भगवान महावीर का अवतरण हुआ, जिन्होंने अपने संपूर्ण जीवन को प्रयोगशाला बनाकर उसके संशोधन के माध्यम से संसार को अहिंसा कि एक क्रांतिकारी देन दी।

इसी शृंखला में आचार्य विद्यासागर वर्तमान के वर्धमान हैं यह कहते हुए अतिशयोक्ति नही होगी। जिन्होंने सैकड़ों शिष्यों को दिगंबर दीक्षा देकर मुनि धर्म अंगीकार करवाया है।

उन्होंने ने कहा कि शरद पूर्णिमा पर कर्नाटक के सदलगा गांव में पिता मलप्पा माता के घर विद्याधर का जन्म हुआ। जिसने आचार्य ज्ञानसागर से दीक्षा लेकर विद्यासागर नाम को सार्थक किया।प्रवक्ता रोहित छाबड़ा ने बताया भारत-भू पर सुधारस की वर्षा करने वाले अनेक महापुरुष और संत कवि जन्म ले चुके हैं। उनकी साधना और कथनी-करनी की एकता ने सारे विश्व को ज्ञान रूपी आलोक से आलोकित किया है। इन स्थितप्रज्ञ पुरुषों ने अपनी जीवनानुभव की वाणी से त्रस्त और विघटित समाज को एक नवीन संबल प्रदान किया है। जिसने राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और संस्कृतिक क्षेत्रों में क्रांतिक परिवर्तन किये हैं। उन्होंने बताया कि भगवान राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, ईसा, हजरत मुहम्मदौर आध्यत्मिक साधना के शिखर पुरुष आचार्य कुन्दकुन्द, पूज्यपाद्, मुनि योगिन्दु, शंकराचार्य, संत कबीर, दादू, नानक, बनारसीदास, द्यानतराय तथा महात्मा गाँधी जैसे महामना साधकों की अपनी आत्म-साधना के बल पर स्वतंत्रता और समता के जीवन-मूल्य प्रस्तुत करके सम्पूर्ण मानवता को एक सूत्र में बाँधा है।

प्रवक्ता रोहित छाबड़ा ने जानकारी देते हुए कहा कि उनके त्याग और संयम में, सिद्धांतों और वाणियों से आज भी सुख शांति की सुगन्ध सुवासित हो रही है। जीवन में आस्था और विश्वास, चरित्र और निर्मल ज्ञान तथा अहिंसा एवं निर्बैर की भावना को बल देने वाले इन महापुरुषों, साधकों, संत कवियों के क्रम में संतकवि दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज वर्तमान में शिखर पुरुष हैं, जिनकी ओज और माधुर्यपूर्ण वाणी में ऋजुता, व्यक्तित्व में समता, जीने में संयम की त्रिवेणी है। जीवन-मूल्यों को प्रतिस्ठित करने वाले बाल ब्रह्मचारी श्री विद्यासागर जी स्वभाव से सरल और सब जीवों के प्रति मित्रवत व्यवहार के संपोषक हैं, इसी के कारण उनके व्यक्तित्व में विश्व-बन्धुत्व की, मानवता की सौंधी-सुगन्ध विद्यमान है। आश्विन शरदपूर्णिमा संवत 2003 तदनुसार 10 अक्टूबर 1946 को कर्नाटक प्रांत के बेलग्राम जिले के सुप्रसिद्ध सदलगा ग्राम में श्रेष्ठी श्री मलप्पा पारसप्पा जी अष्टगे एवं श्रीमती श्रीमतीजी के घर जन्मे इस बालक का नाम विद्याधर रखा गया। धार्मिक विचारों से ओतप्रोत, संवेदनशील सद्गृहस्थ मल्लपा जी नित्य जिनेन्द्र दर्शन एवं पूजन के पश्चात ही भोजनादि आवश्यक करते थे। साधु-सत्संगति करने से परिवार में संयम, अनुशासन, रीति-नीति की चर्या का ही परिपालन होता था।प्रवक्ता ने बताया कि आप माता-पिता की द्वितीय संतान हो कर भी अद्वितीय संतान है। बडे भाई श्री महावीर प्रसाद स्वस्थ परम्परा का निर्वहन करते हुए सात्विक पूर्वक सद्गृहस्थ जीवन-यापन कर रहे हैं। माता-पिता, दो छोटे भाई अनंतनाथ तथा शांतिनाथ एवं बहिनें शांता व सुवर्णा भी आपसे प्रेरणा पाकर घर-गृहस्थी के जंजाल से मुक्त हो कर जीवन-कल्याण हेतु जैनेश्वरी दीक्षा ले कर आत्म-साधनारत हुए। धन्य है वह परिवार जिसमें सात सदस्य सांसारिक प्रपंचों को छोड कर मुक्ति-मार्ग पर चल रहे हैं। इतिहास में ऐसी अनोखी घटना का उदाहरण बिरले ही दिखता है।

प्रवक्ता ने बताया कि विद्याधर का बाल्यकाल घर तथा गाँव वालों के मन को जीतने वाली आश्चर्यकारी घटनाओं से युक्त रहा है। खेलकूद के स्थान पर स्वयं या माता-पिता के साथ मन्दिर जाना, धर्म-प्रवचन सुनना, शुद्ध सात्विक आहार करना, मुनि आज्ञा से संस्कृत के कठिन सूत्र एवं पदों को कंठस्थ करना आदि अनेक घटनाऐं मानो भविष्य में आध्यात्म मार्ग पर चलने का संकेत दे रही थी। आप पढाई हो या गृहकार्य, सभी को अनुशासित और क्रमबद्ध तौर पर पूर्ण करते। बचपन से ही मुनि-चर्या को देखने , उसे स्वयं आचरित करने की भावना से ही बावडी में स्नान के साय पानी में तैरने के बहाने आसन और ध्यान लगाना, मन्दिर में विराजित मूर्ति के दर्शन के समय उसमे छिपी विराटता को जानने का प्रयास करना, बिच्छू के काटने पर भी असीम दर्द को हँसते हुए पी जाना, परंतु धार्मिक-चर्या में अंतर ना आने देना, उनके संकल्पवान पथ पर आगे बढने के संकेत थे।

समाज के अध्यक्ष विजय रारा व उपाध्यक्ष मनोज सरावगी ने जानकारी देते हुए कहा कि इसी शृंखला में २२ अक्टूबर १९३४ शरदपूर्णिमा के शुभ दिन मैना के रूप में ज्ञान का अवतार, सरस्वती का भंडार, गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी का अवतरण टिकैतनगर में हुआ था। जिनके आवतरण दिवस को मनाने का सौभाग्य हमें प्राप्त हो रहा है।उन्होंने बताया कि जो अपने आप को जीत कर कर्मों का नाश करने में समर्पित रहते हैं, उन्हीं की जन्मजयंती या दीक्षा दिवस मनाया जाता है।उन्होंने बताया कि पूज्य माताजी की प्रतिभा बहुमुखी है। दर्शनशास्त्र, धर्म, अध्यात्म, गणित, भूगोल, खगोल, नीति, इतिहास, कर्मकांड आदि विषयों पर उनका समान अधिकार है और यह देखने के पश्चात् ऐसा लगता है कि वे बहुत उच्च शिक्षित, किसी विद्यापीठ की डॉक्टरेट या डी.-लिट् उपाधि हासिल की हुई हैं परन्तु वे तो मात्र स्कूल में प्राइमरी कक्षा तक ही पढ़ी हुई हैं। फिर इतना ज्ञान का भंडार उनमें समाकर वे कैसे ज्ञानमती माता कही जाती हैं? तो अवलोकन करने के पश्चात् पता चलता है कि उन्होंने अपने जीवन को सत्यान्वेषण और संयम की महासाधना में लगाया और उसके कारण आज वे इस मुकाम पर पहुँची हैं।

उन्होंने कहा कि दुनिया में चार प्रकार की माताएँ होती हैं….यह महामाता तथा जगतमाता है। जिसके आशीर्वाद से हम आत्मकल्याण के पथ पर कदम बढ़ाते हैं और अविनाशी सुख की प्राप्ति कर लेते हैं।ऐसी यह जगत्माता संस्कारों की प्रतिमूर्ति, संस्कृति की संवर्धिका, सरस्वती की आराधिका, विचारों के संकल्पों को साकाररूप देने वाली, असीम गुणों की भण्डार, जैन समाज की ज्योतिर्मय नक्षत्र एवं जैन संस्कृति की उन्नायक हैं। जिनका 18 वर्ष की छोटी सी आयु में लगाया गया वह वैराग्य का नन्हा-सा पौधा, आज विशाल वटवृक्ष रूप धारण कर चुका है।

जिसमें कई धर्मानुरागीजन, श्रावक-श्राविकाएँ, ब्रह्मचारिणियाँ, मुनिगण छाया, स्नेह और शीतलता प्राप्त कर रहे हैं। वीर प्रभु से प्रार्थना है कि यह वटवृक्ष दिनोंदिन घना और विशाल होता रहे तथा चिरकाल तक पीड़ित मानव को अपनी छाया प्रदान करता रहे। उन्होंने कहा पर्वत में ऊँचाई तो होती है, पर गहराई नहीं। सागर में गहराई तो होती है, पर ऊँचाई नहीं। गहराई और ऊँचाई यदि किसी में एक साथ देखना हो, तो वह गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी में मिलेगी। आप में ज्ञान की गहराई व चारित्र की ऊँचाई एक साथ मुखर हो उठी है। माताजी की वाणी में सृष्टि का सार, जीवन का सौंदर्य, मानवता का मर्म, मनुष्यत्व की गरिमा, संस्कृति का स्वरूप, मुक्ति की प्रेरणा, तप और संयम का उत्कर्ष तथा जागरण का शंखनाद सुनाई देता है। उनके हृदय में दया, क्षमा, वात्सल्य, सहनशीलता और स्नेह का सागर हिलोर लेते रहता है।मंत्री कमल पहाड़िया ने कहा कि आज शरद पूर्णिमा को आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं आर्यिका माँ ज्ञानमती माताजी का अवतरण दिवस हमने बनाया है । भगवान से प्रार्थना है कि उनका मंगल सानिध्य, मंगल आशीर्वाद एवं मंगलमयी देशना हम सभी लोगों को सदा प्राप्त होती रहे।

रोहित कुमार छाबड़ा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!
Close