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पाप ही खतरनाक है ये बात सोचकर पाप से और पाप के निमित्तों से दूरी बनानी है : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर । दि. 21 सितम्बर 2020 श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य विजय भव्यदर्शन सूरीश्वरजी म. ने धर्म संदेश में बताया कि –  आत्मा को पीड़ा क्यों प्राप्त होती है । पीड़ा बिना पाप नहीं आती । सुख कब मिलता है ? पुण्य के बिना सुख कभी नहीं मिलता । इसका मतलब ये हुआ कि सुख पुण्यकर्म का फल है तो दुःख पापकर्मों का नतीजा है । बिना कर्म सुख या दुःख नहीं आता । वह बिनबुलायें महेमान नहीं है । दोनों को आमंत्रण-निमंत्रण देनेवाली अपनी आत्मा ही है ।

आमंत्रण देने के मौके पर सोचे तो दुःख को आमंत्रण देते वक्त जीव को मज़ा आती है । सुख को आमंत्रित करने में कष्ट भुगतना पड़ता है । मन को मारना पड़ता है । काया को मनाना पड़ता है । वचन के ऊपर ठीक ठीक निमंत्रण रखना पड़ता है । क्योंकि मन-वचन-काया के माध्यम से ही सब प्रवृत्ति होती है ।इन्सान साँप से ड़रता है, उतना पाप से नहीं ड़रता । कई लोग अपनी इज्जत के कारण पाप नहीं करते है । कई लोग निंदा के ड़रसे पाप नहीं करते है । ऐसे भिन्न-भिन्न कारणों के कारण पाप नहीं करने वाले बहोत लोग मिलेंगे, लेकिन पाप का कटुफल (विपाक) इस लोक में या परलोक में मेरे को ही भुगतना है, जब ये पाप उदय में आयेंगे तब कोई बचानेवाले नहीं आयेंगे । मुझे वह पाप भुगतने के लिए नरकगति या तिर्यंचगति में जाना पड़ेगा ।

पड़े-पौधे या पृथ्वी-पानी के स्वरूप में जन्म लेकर ठंड-गर्मी, भूख-प्यास वगैरह पीड़ा मुझे ही भुगतनी पड़ेगी । इस सोचके साथ पाप नहीं करने वाले कितने जगत में है ? शास्त्रकार लिखते है – राजदण्ड होगा ऐसे ड़र के कारण पाप न करनेवाले अधम है । परलोक में ये पापों की भारी सजा मिलेगी ऐसे ड़र के मारे पाप न करनेवाले मध्यम है और स्वभाव से ही पाप न करने वाले उत्तम है । वह पाप चोरी का हो, झूठ बोलने का हो, हिंसा का हो, क्रोधादि कषायों का हो… अनीति-अन्याय का हो, माल में मिलावट का पाप हो… लेकिन पाप तो आखिर पाप ही है । गंगा के पानी से या कोई भी भारीवाले साबुन से भी पाप को धोया नहीं जाता । पाप को धोने के उपाय-तरकीब है । उसके अलावा शिर परकने पर भी कर्म-पाप-दुःखोंसे मुक्ति मिलनेवाली नहीं है । हाँ, दुःख के ड़र से न्याय का संबंध नहीं तोड़ना है, लेकिन पाप ही खतरनाक है ये बात सोचकर पाप से और पाप के निमित्तों से दूरी बनानी है । पाप से दूरी बनानेवाला सचमुच दुःख से दूरी बना लेता है और पाप से करीबी बनाने वाला दुःख की करीबी बना लेता है । पापमुक्ति के बिना दुःखमुक्ति असंभवित है । दुःख का द्वेषी और सुख का आशिक़ जीव पाप का ही रास्ता पकड़ता है और पाप करने पर वापस दुःख जीव का पीछा ही करेगा । इस शृंखला को तोड़ने के लिए आपको दुःख के कारण (जड़) स्वरूप पाप के ऊपर ही द्वेष बनाना पड़ेगा ।-आचार्य विजय भव्यदर्शन सूरि ।

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