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पाप की प्रवृत्ति से भी खतरनाक है पापवृत्ति : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

अहिंसा क्रांति न्यूज़ / दलीचंद श्रीश्रीमाल
मैसूर । दि. 30 सितम्बर 2020 श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य विजय भव्यदर्शन सूरीश्वरजी म. ने धर्म संदेश में बताया कि –  विश्व में  सर्वातिशायी और सबसे अधिक कीमती रत्न का नाम है सम्यक्त्वरत्न ।

अध्यात्म को केन्द्र में रखकर यदि सोचना है तो सम्यक्त्व रत्न जिनको प्राप्त हुआ है, वह धनाढ़य है । वही आत्मा तेजगति से मोक्षमार्ग में आगे बढ़ती है । क्योंकि वो कर्तव्य की पूर्णरूप से पहचानता है । कर्तव्य में मूढता रहित होता है । तब तो श्रावक के वंदित्तु सूत्र में भी कहा गया है – सम्यग्दृष्टि जीव को अपनी कक्षा और जिम्मेदारी के जरिए कई आरंभ-समारंभ (पाप) करने पड़ते है, लेकिन वह कार्य करते समय अपने आत्मपरिणाम कठोर या दयाहीन न होने के कारण, औरों की अपेक्षा कर्म का बंध अल्प मात्रा में ही होता है । इतना ही नहीं आगे जाकर शास्त्र में लिखा है – सम्यग्दृष्टि जीव जो भी कार्य करता है, उसमें कर्म -निर्जरा की भावना से करता है । वो पाप से थरथर कांपता है । पाप की प्रवृत्ति करने पर भी पाप की वृत्ति से परे रहता है ।

क्योंकि पाप की प्रवृत्ति से भी खतरनाक है पापवृत्ति ।संबोध सत्तरी नाम के ग्रंथ में कहा है – चारित्र से भ्रष्ट हुई आत्मा मुक्ति में पहुँच सकती है लेकिन सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट आत्मा की मुक्ति कभी नहीं होती । बिना सम्यग्दर्शन तप-ज्ञान-चारित्र पूर्ण सफल नहीं होते है । सम्यक्त्व नीव है, फाऊन्डेशन है । बिना नीव कोई भी इमारत खड़ी नहीं हो पाती । देखने में नीव भले न दिखती हो, लेकिन महत्त्व तो नीव का है । लोग मकान के रूप रंग देखते है, आकर-प्रकार का अवलोकन करते है । जड़े-मढ़े हुए पदार्थों को देखते है । सजावट को देखकर खुशी व्यक्त करते है लेकिन नीव के तरफ़ कौन नज़र करते है । सबकुछ सही है, सुंदर है अपितु नीव में गड़बडी है तो ? मकान का – मकान की आयु का कोई भरोसा नहीं रहता ।

उसी तरह सम्यग्दर्शन रूपी नीव में अगर गड़बड़ है तो ज्ञान-चारित्र-तपादि भले कितने भी अच्छे दिखते हो… मगर भरोसापात्र नहीं होता । उन चीजों का पूर्ण फल नहीं मिलता । क्योंकि – उन ज्ञान-तप-चारित्रादि के आगे ‘सम्यग्’ शब्द का इस्तेमाल नहीं होता है । सम्यग् न बनने पर उनका प्रभाव कर्मों या दुर्गुणों के ऊपर नहीं पड़ता ।बिना सम्यग्दर्शन वह आत्मा नौ पूर्व तक पढ़ी हो, फिर भी अज्ञानी कही जायेगी और सम्यग्दर्शन रहते वह मात्र अष्टप्रवचन माता की जानकारी रखता है तो ज्ञानी कही जायेगी । ये सब प्रभाव सम्यग्दर्शन का ही है, मानो रिज़र्व बैंक का स्पेम्प लग गया और गवर्नर की साईन हो गई । बिना रिज़र्व बैंक का स्पेम्प और गवर्नर की साईन (हस्ताक्षर) 2000 की नोट की भी कुछ किमत नहीं होती ।

उसका एक रूपया भी कोई नहीं देगा । मतलब यह हुआ कि – सम्यग्दर्शन ही रज़िस्टर्ड ट्रेडमार्क है । उसके कारण धर्म-सद्धर्म बनता है । हरएक क्रिया में प्राण(जान) आते है । हरएक तप-जप-ज्ञानादि चैतन्यवान बनते है । चारित्र ले लेने पर आत्मा की मुक्ति निश्चित नहीं होती, जबकि एकबार भी सम्यग्दर्शन आ गया – पा लिया तो मुक्ति अर्धपुद्गलपरावर्त में रिज़र्व हो जाती है । निश्चित कर ले सकते है । इसी कारण सम्यक्त्व सबसे बड़ा-महारत्न है ।

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