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पहले राज महाराजा दीक्षा ग्रहण करते थे इसलिए धर्म प्रभावना होतीं थी–सुधासागरजी

अहिंसा क्रांति अखबारभीलवाड़ा- -बस्त्र नगरी भीलवाड़ा में श्री मद जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महा महोत्सव की विशाल धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि पुगंव सुधासागरजी ने कहा कि पहले राजा महाराजा दीक्षा ग्रहण करते थे इसलिए धर्म प्रभाव अपने आप उनके दीक्षा ग्रहण करते होतीं थी कम पुण्य वालो को गरीब को दीक्षा देने के लिए आचार्य जिनसेन स्वामी ने मना किया है यदि दिगम्बर साधु को कोई आहार नहीं दे रहा उसके साथ विहार आदि में नहीं जा रहा तो धर्म की हँसी होगी इसलिए पहले राजा महाराजा को दीक्षा के प्रसंग पुराण ग्रन्थो में खुव पड़ने को मिलते है ।इससे पहले थूवोनजी कमेटी के प्रचार मत्री विजय धुर्रा धीरज जैन यशा सघिई रीना जैन सहित अन्य भक्तों ने मुनि श्री को श्री फल भेंट किए।समारोह को संबोधित करते हुए मुनि पुगंव सुधासागरजी महा राज ने कहा कि जब चक्रवर्ती भगवान को साटग नमोस्तू करता है तो राजा लोग असचरिय चकित होकर कहते हैं कि भला चक्रवर्ती से भी कोई वड़ा है तव भरत चक्रवर्ती कहते हैं कि मैं भगवान के चरणों की धूल भी नहीं हूँसौधर्म इन्द्र वालक भगवान को गोद में लेकर अपने को धन्य मानता है- सुधासागरजीमुनि पुगंव सुधासागरजी महा राज ने कहा कि ससार का सबसे बड़ा नारी पद सचि का होता हैं वह सचि प्रसूति ग्रह में हल के जन्मे वालाको अपनी गूदि में उठा लिया जिस बालक को दुनिया गंदा मानती है उस बालक को सौधर्म इन्द्र ने गोदी में उठा लिया और सूमेरी पर्वत पर ले जाकर अभिषेक करता है और सारे देवता एक एक वूंद गंधोदक को अपने सिर पर धारण करते हैंरिषभ देव कोसारी दुनिया ने अपना राजा वनालियााऔर आपने मुनि व्रत लेकर मुनि पद को धन्य कर दिया हम सब रत्न त्रय को धारण कर हम धन्य होते हैंजितने वड़े वड़े एक्टर होते हैं वे तेल की शीशी को दिखाने का कारोड़ो रूपय ले लेते है फिर जिस पद को तीर्थंकर भगवन ने धारण कर लिया तो वह धन्य हो गया जो आपने वेटा वहू को खूश नहीं कर पाये वे वानप्रस्त को भी धन्य करें ।वानप्रस्त भी उनके लिए है जिनके वेटा वहू आपने सास ससूर को छोड़ना नहीं चाहते वे धर्म की प्रभावना कर सकतेचतुर्थ काल में धर्म की महिमा इसलिए थी पहले राजा महाराजा दीक्षा ग्रहण करते थे इसलिए धर्म की प्रभावना होती थी भगवान को केवलज्ञान होने से भगवान धन्य नहीं हुये केवलज्ञान ज्ञान धन्य हो गया समवशरण पाकर भगवान धन्य नहीं हुये समवशरण धन्य हो गया भगवान को पाकर ।

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