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पर्युषण पर्व आत्म साधना का पर्व : आचार्य महाश्रमण

ब्यूरो चीफ – राजेन्द्र बोथरा


हैदराबाद। तीर्थंकर के प्रतिनिधि तेरापंथ के 11 वें अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सानिध्य में जैन धर्म के महान पर्व पर्यूषण का आज शुभारंभ हुआ। नौ दिवसीय इस पर्व में सभी विशेष रूप से तपस्या, साधना एवं आराधना आदि उपक्रम करते है। प्रथम दिवस पर मंगल उद्बोधन देते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि आज जैन शासन और श्वेतांबर परंपरा का धर्म आराधना का महान पर्व पर्यूषण का प्रारंभ हुआ है।चतुर्मास में भाद्रव महीना जैन शासन व जैन धर्म की दृष्टि से सामूहिक रूप में अध्यात्म कि आराधना के लिए अति उपयोगी होता है। आज पर्युषण पर्व का प्रारम्भ हुआ है। पर्युषण का यह आठ दिन का समय धर्माराधना का विशेष समय होता है। यह आत्म साधना का एक प्रेरक पर्व व सुंदर अवसर है।

हमारे  24 वें व अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर हुए।  भगवान महावीर एक चैतन्य पुरुष थे। दुनिया में दो प्रकार की विचार धाराएं है-  नास्तिक विचारधारा वाले आत्मा और शरीर को अलग अलग नहीं मानते जबकि हम आस्तिक विचारधारा वालों का मानना है कि आत्मा अलग और शरीर अलग है। दोनों विचारधाराएं एक दुसरे के विपरीत हैं। आत्मा का स्वतंत्र व त्रेकालिक अस्तित्व है वह कल भी थी, आज भी है और आगे भी रहेगी। शरीर विनाशी व आत्मा अविनाशी होती है। आत्मा के शाश्वत अस्तित्व की बात ही पूर्व जन्म को पुष्ट बनाती है। आस्तिक दर्शन का सिद्धांत है आत्मवाद व पुनर्जन्म वाद साथ में कर्मवाद भी एक सिद्धांत है और ये तीनों परस्पर मिले हुए हैं। आत्मा अनेक बार जन्म-मरण कर चुकी है ।

कर्मों के क्षय होने पर ही यह  भ्रमण बंद होता है और मोक्ष प्राप्ति हो जाती है । इस सत्य को  हमें समझना हैं। आचार्य प्रवर ने आत्मवाद, पुनर्जन्मवाद व कर्मवाद सिद्धांतों के परिपेक्ष्य में भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा का वर्णन करते हुए  कहा कि भगवान के सताइस भवों में पहला जन्म जंबू द्वीप के एक ग्राम में नयसार नामक व्यक्ति के रूप में हुआ। एक बार वह राज आज्ञा से जंगल में लकड़ियां लेने गया, जंगल में जब वह भोजन करने बैठा तो उसने देखा कि कुछ साधु मार्ग भूलकर इधर आ गए है। साधुओं को देखकर नयसार के मन में भक्तिभाव जागा और नयसार ने आहार पानी का दान दिया फिर उन्हें सही मार्ग बताया। संतो ने भी नयसार को आत्म कल्याण का मार्ग बताया जिससे नयसार को एक प्रकाश मिल गया और वह प्रकाश था  सम्यक दर्शन का। इससे नयसार को मिथ्यात्व से छुटकारा मिला व सम्यक दर्शन की प्राप्ति हो गई। तथ्यों व यथार्थ को जान लेना व उनके प्रति श्रद्धा हो जाना सम्यक दर्शन है। नयसार  वहां से प्रथम देवलोक में उत्पन्न हुआ।


*खाध संयम दिवस*पर्यूषण के प्रथम दिन खाद्य संयम पर प्रेरणा देते हुए गुरुदेव ने आगे कहा कि हमारा शरीर औदारिक शरीर है इसे चलाने के लिए खाना भी जरूरी होता है। यह ध्यान में रहना चाहिए की भोजन जीवन चलाने का साधन है साध्य नहीं। कहीं भूल से यह साधन हमारा साध्य न बन जाये। खाने के लिए जीना नहीं बल्कि जीने के लिए खाना पड़ता है, भोजन के लिए तन नहीं होता, तन के लिए भोजन है।  आज के दिन उपवास व तपस्या करने वाले भी बहुत लोग होते हैं कई जन तेला व आगे भी बढ़ते है। आत्म साधना कि दृष्टि से भी भोजन संयम का बड़ा महत्व है। जैन साधना पद्धति में अनशन, अनोदरी, रस परित्याग ये निर्जरा के प्रकार है और आहार संयम के प्रतीक है। खाने में द्रव्य सीमा करें, रात्रि भोजन से भी बचने का प्रयास हो, चोविहार नहीं तो तिविहार ही सही। पूज्य प्रवर ने गीत के माध्यम से बताया कि खाने में लोलुपता न रख कर समता भाव से भोजन की निन्दा प्रशंसा से बचना चाहिए।


*स्वतंत्रता दिवस*शांतिदूत ने स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में फरमाया – पर्यूषण पर्व के साथ आज भारत का स्वतंत्रता दिवस भी है। हर व्यक्ति स्वतंत्रता चाहता है, पर स्वतन्त्रता के लिए तपना भी पड़ता है। भारत के पास प्राचीन धार्मिक ग्रंथों की संपदा है अनेक पंथ और मनीषी  विद्वान संतो कि भी सम्पदा भारत को प्राप्त हैं। यह अपने आप में विशेष हैं इनकी पूरी सुरक्षा हो। इनके तीनों के सहारे हमें ज्ञान, प्रेरणा व सन्मार्ग मिलता रहे तो भारत और आगे बढ़ सकता हैं, और महान बन सकता है। देश में आर्थिक, भौतिक विकास के साथ नैतिकता, आध्यात्मिकता का भी विकास होना चाहिए। बेईमानी से भी हमें स्वतंत्रता मिले, देश हर क्षेत्र में आगे बढ़े यही कामना है।इससे पूर्व कार्यक्रम में मुख्यमुनि महावीर कुमार जी ने धर्म के प्रकार क्षांति पर विश्लेषण किया एवं मुख्य नियोजिका साध्वी विश्रुतविभा जी ने पर्युषण के महत्व पर प्रकाश डाला।

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