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नशे से आती है शान में कमी : आचार्य महाश्रमण

AHINSA KRANTI NEWS

हैदराबाद। अध्यात्म जगत के महासूर्य शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी ने जैनागम ठाणं पर आधारित प्रवचन माला के अंतर्गत व्याख्या करते हुए कहा- साधु के लिए दो प्रकार की साधना प्रणाली का उल्लेख आता है। पहली है संघबद्ध साधना एवं दूसरी है एकाकी साधना। पहले में वह गण में, धर्मसंघ में रहकर साधना करता है और एकाकी साधना में साधक अकेले साधना करता है। अकेले साधना करने वाले के लिए शास्त्र में आठ अर्हताओं का वर्णन किया गया है। साधक में ये योग्यताएं हो तो वह एकाकी साधना कर सकता है।

प्रथम है श्रद्धा। साधक के मन में श्रद्धा होनी चाहिए। भीतर में सम्यक्त्व मजबूत होना चाहिए। श्रद्धा होती है तो कठिन से कठिन कार्य भी आसान बन जाता है। दूसरा वह सत्यवादी होना चाहिए। साधना के लिए जो प्रतिज्ञा ली है उसका प्रामाणिकता से पालन करना। तीसरी अर्हता है कि वह मेधावी होना चाहिए। उसमें श्रुत ग्रहण करने की क्षमता हो। चौथा वह श्रुतपुरुष यानि बहुश्रुत होना चाहिए। पांचवा उसमें शक्ति होनी चाहिए। साधना से पहले तपस्या के द्वारा शक्तिशाली बन जाए। अभय की शक्ति उसमें हो कि अभ्यास के लिए श्मशान में अर्धरात्रि में  कायोत्सर्ग करने जाना हो तो भी विचलित नहीं हो।

नींद पर भी विजय होनी चाहिए। छठा वह कलहकारी नहीं हो, शांत स्वभाव वाला हो। सातवां गुण की उसमें धृति हो। प्रतिकूल परिस्थिति में भी सहन करने वाला साधक हो और आठवीं अर्हता उसमें वीर्यसंपन्नता हो। साधना जो स्वीकार की है उसके प्रति उत्साह बना रहे। इस प्रकार ये आठ कसौटियां है। आचार्य के लिए भी विधि आती है कि वह भी साधना के विशेष प्रयोग के लिए एकाकी साधना कर सकते हैं। हालांकि वर्तमान में तो एकल प्रतिमा की साधना मुमकिन नहीं है। हम गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी को देखें अपने आचार्यपद का विसर्जन कर वे और साधना में लग गए। अपने शिष्य को आचार्यपद देकर अपने पद का परित्याग कर दिया। तो यह साधना के प्रकार है जिसका ठाणं आगम में वर्णन हुआ है।
*अणुव्रत सप्ताह का पांचवा दिन नशामुक्ति दिवस* अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी ने नशामुक्ति पर प्रेरणा देते हुए कहा कि दुनियां में नशा चलता है। नशा अगर जीवन में है तो शान में कमी आ सकती है। व्यक्ति शराब पीता है उससे उसका चित्त भ्रांत हो जाता है और वह अपराध आदि में पाप कर दुर्गति में चला जाता है। शराब के अलावा अन्य भी धूम्रपान, तंबाकू आदि इतने नशे हैं। व्यक्ति का संकल्प हो की नशा नहीं करना। अणुव्रत का एक आयाम है नशामुक्ति। मुख मंदिर में मदिरा का प्रवेश ही न हो, अणुव्रत का यह संदेश जन जन तक पहुंचे। कितने गरीब नशा करते हैं, पैसा कमाते हैं नशे में लगा देते हैं। ये गरीबी तो एक है पर आत्मा की गरीबी फिर कैसे मिटे। युवको-किशोरों में संकल्प जागे नशा नहीं करेंगे।

परिवार में भी माता-पिता जागरूक रहें कि लड़के की संगत कैसी है, गलत संस्कार तो नहीं आ रहे ना। कोई कहने वाला नहीं हो तो गलत संस्कार आ सकते हैं। माता-पिता प्रेरणा देते रहें। विद्यालयों में भी ऐसी नशा मुक्ति की प्रेरणा मिले। नशे के निमित्त से अनेक-अनेक समस्याएं होती है। हमारे जैन श्वेतांबर तेरापंथ समाज में भी नशा न हो। युवा पीढ़ी, किशोर पीढ़ी बुराइयों से बची रहे।*प्रेक्षाध्यान दिवस*कार्यक्रम में तत्पश्चात प्रेक्षाध्यान दिवस मनाया गया। आचार्य श्री ने प्रेक्षाध्यान के बारे में फरमाते हुए कहा कि प्रेक्षाध्यान एक आध्यात्मिक प्रवृत्ति है। राग-द्वेष मुक्त रहना, शरीर का, वाणी का, मन का, संयम का अभ्यास करना प्रेक्षाध्यान है। जैन विश्वभारती में प्रेक्षा फाउंडेशन विभाग है, प्रेक्षा इंटरनेशनल भी है, प्रेक्षा विश्व भारती भी है और प्रेक्षावाहिनी भी है। प्रेक्षाध्यान जैन विश्वभारती का एक मुख्य उपक्रम है। और भी अनेक जगह प्रेक्षाध्यान से जुड़े हुए उपक्रम चलते है। प्रेक्षाध्यान पद्धति में अनेक योग भी है, आसन भी है, प्राणायाम भी है, कई ध्यान के प्रयोग भी है। प्रेक्षाध्यान का एक नेटवर्क है, कितने प्रशिक्षक, साधक इससे जुड़े हुए हैं उनका ध्यान का प्रयोग चलता रहे और अच्छी व्यवस्था से यह प्रेक्षाध्यान का क्रम चलता रहे। मूल बात है हमारी आत्मा ध्यान का स्थान बन जाए। आत्मा में हम ध्यान करें। आत्मकल्याण का प्रयास करें।  प्रेक्षाध्यान दिवस पर प्रेक्षाध्यान का समुचित रूप में प्रयोग करने का प्रयास करें। अचार्यप्रवर ने उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रेक्षाध्यान के प्रयोग भी करवाएं।आचार्यप्रवर के सानिध्य में जैन विश्व भारती के अधिवेशन का भी आज समायोजन हुआ। आचार्यवर ने कहा- जैन विश्वभारती एक बड़ी संस्था है और यहां गतिविधियां भी अच्छी चलती है। नई गतिविधि के रूप में प्रेक्षा इंटरनेशनल स्कूल का कार्य आगे बढ़े तो अच्छा है। जहां अच्छा ज्ञान, अच्छी विद्या, अच्छे संस्कार हो। ऐसा वह विद्या संस्थान बने। जैन विश्वभारती के कार्यकर्ताओं में काम का संकल्प बना रहे, कार्य अच्छा हो। इस अवसर पर जैन विश्व भारती के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि कीर्तिकुमार जी मुख्यन्यासी मनोज जी लुनिया ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

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