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डरता वह है, जो अपराधी है, पापी है, हत्यारा है, जिसने गुनाह किया है : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा.

AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर। श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य विजय भव्यदर्शन सूरीश्वरजी म. ने धर्म संदेश में बताया कि – जैनागम जगत के एक आगम में लिखा है – ‘ णो भायव्वं, भीतं खु भया अइंति लहुयं।’ इस छोटे से सूत्र में बहुत कुछ कह दिया है । सबसे पहले अपन यह सोचना है कि – डरता है कौन ?  डर कब लगता है ?   कहाँ डरना चाहिए ?   कहां नहीं डरना चाहिए ?  दुनिया किससे डरती है ?  इन्सान किससे डरता है ?  जैन शासन कहता है – डरने में भयसंज्ञा और भयमोहनीयकर्म की अहमभूमिका है । ऊपर दिये गए सूत्र का सामान्य अर्थ है – डरना नहीं चाहिए ।

जो डरता है, उसके निकट भय शीघ्र आता है ।डरता वह है, जो अपराधी है, पापी है, हत्यारा है, जिसने गुनाह किया है । जो निरपराधी है, निष्पाप है, ईमानदार है, सज्जन है, उनको सामान्य से डर नहीं लगता । जो साधु है वह निष्पाप-निरपराध…है, उनको आंतरिक भीति नहीं रहती । जो अपराधी-पापी… है उन लोगों को बहार कुछ होने पर भी अंदर से डर लगता है । अपना ही अपराध-गुनाह चुभने लगता है । सजा में भी दो प्रकार है । 1.राज्य-सरकार-पोलिस-जेल वगैरह की सजा का डर लगता है । मतलब, शारीरिक पीड़ा का डर जीवों को है, मगर शारीरिक पीड़ा देनेवाले पापों का डर नहीं है ।जैसे चोरी करते वक्त चोर को डर नहीं लगता है, जब चोर पकड़ा जाता है, चोरी की सजा सुनाई जाती है, सजा भुगतने के लिए कस्टड़ी में जाना पड़ता है, लोगों में निंदा-तिरस्कार होते है ।

तब ड़र लगता है । लेकिन दुःखों से डरकर, लोग घृणा की दृष्टि से देखेंगे वगैरह सोच से पाप न करनेवाला तो अधम कहलाता है । पाप की सजा परलोग में मिलनेवाली है, यह सोचकर जो पाप नहीं करती-वह आत्मा उत्तम है ।जो दुःखों से डरता है, वो आर्तध्यान में फंस जाता है, दुर्ध्यान से नये कर्मोपार्जन करता है । दुःख को तो हंसते मुह सहना है । ऐसे करने से दुःख से मुक्ति प्राप्त होती है । रोते हुए – दुःख से डरकर पीड़ा सहनेवाला नया पाप बांध लेता है । इसी कारण शास्त्रकार कहते है – पाप के उदयकाल में यानी दुःख-पीड़ा आने पर नहीं, पाप बांधते वक्त यानी हिंसा-झूठ-चोरी-क्रोधादि पाप करने के समय ड़रना है ।

वो डर आपको पापमुक्ति ओर आगे बढ़ायेगा । पाप से मुक्त होने पर दुःखमुक्ति आप ही आप हो जायेगी । इसका अर्थ ये हुआ कि हमारी मेहनत दुःख को भगाने की नहीं पाप को भगाने की होनी चाहिए । क्योंकि पाप के बिना दुःख का आगमन कभी नहीं होता । तब तो लिखा गया – ‘दुःखं पापात्।’ पाप से ही दुःख आता है और यह बात हरएक धर्म में मान्य है । सब धर्मशास्त्रों में यह बात लिखा है ।‘डर गया सो मर गया’ कहावत क्यों हुई ? आज-कल कोरोना के चलते जो लोग मर रहे है, उसमें से ज्यादा तो बीमारी से नहीं किंतु बीमारी के डर से ज्यादा मर रहे है ।

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