जैन प्रवचन jain pravchanजैन समाचार

ज्ञान के कारण ही ज्ञानी का बहुमान होता है : आचार्य भव्यदर्शन सूरीश्वर म. सा

AHINSA KRANTI NEWS

मैसूर । दि. 24 सितम्बर 2020 श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्त्वावधान में महावीर भवन में चातुर्मास बिराजित आचार्य विजय भव्यदर्शन सूरीश्वरजी म. ने धर्म संदेश में बताया कि –  विश्व में ज्ञान की पूजा कहाँ नहीं होती ? हर जगह ज्ञान की पूजा होती है । ज्ञान के कारण ही ज्ञानी का बहुमान होता है । ज्ञान के दो भेद है । 1.आत्मा लक्षीज्ञान यानी आत्मा को केन्द्र में रखकर जो ज्ञान प्राप्तकरते है । अध्यात्म विकास के लिए जिसका उपयोग होता है । अंततः जाकर वह ज्ञान आत्मगुणों के अर्जन में और दोषों के निष्कासन में उपयोगी बनता है । वह ज्ञान सही अर्थ में ज्ञान है जो आत्मा को मुक्ति की ओर आगे बढ़ाने का कार्य करता है । ऐसे ज्ञानरूपी अमृत का भोजन । अमृत खाने-पीनेवाला अमर बन जाता है । ऐसे ज्ञान को दूसरे सूर्यकी, तीसरी नेत्र की भी उपमा दी गई है । दूसरी ओर अज्ञानी और अंध को समान करार दिया है ।

अध्यात्म के तौर पर देखा जाय तो अज्ञान ही अंधत्व है । अज्ञान बड़ा रोग भी है । बिना ज्ञान कोई ज्ञानी नहीं बन सकता । व्यवहार भाष्य में लिखा है – जगत के समस्त रहस्य-भावों को प्रकाशित करनेवाला ज्ञान है ।आत्मा से लेकर जगत के तमाम-सारें पदार्थो के स्वरूप को संशय-विमोह और विभ्रमरहित जानना सम्यग्ज्ञान है ऐसा शास्त्र में कहा है । बृहत्कल्प नाम के ग्रंथ में लिखा है – ज्ञान मानव को नम्र बनाता है । मृदु और सरल बनाता है । लेकिन जो मनुष्य उस ज्ञान से ही मदोन्मत बनता है – अधजलगगरी के भांति छलकने लगता है, उनके लिए अमृत जैसा ज्ञान भी विष-ज़हर बन जाता है । ज्ञान आने पर तत्त्व-अतत्त्व, भक्ष्य-अभक्ष्य, पेय-अपेय, गम्य-अगम्य, कर्तव्य-अकर्तव्य की पहचान होनी चाहिए । ज्ञान के बिना ध्यान भी सिद्ध नहीं होता । सम्यग्ज्ञान के जैनशास्त्रों में पांच प्रकार बतायें हैं ।

1.मतिज्ञान 2.श्रुतज्ञान 3.अवधिज्ञान 4.मनःपर्यवज्ञान और 5.केवलज्ञान ।ज्ञान का दूसरा भेद है – संसार लक्षी – भौतिक लक्षी ज्ञान यानी जिन जिन ज्ञान को पाकर बंगला-बाग बनाने की भावना हो… ज्ञान से उपाधि (ड़िग्री) प्राप्त करके पैसे कमाने की उम्मीद हो । पांच इन्द्रियों को बेहकानी वाली सामग्री प्राप्त करके उसमें लिप्त होने का उद्देश्य हो । मान-सम्मान प्राप्त करने का भाव हो । जगत में नाम कमाने की मनोकामना हो । जो ज्ञान पाकर भी पापभीरु न बनना हो वह वास्तविक ज्ञान ही नहीं है । यह ज्ञान प्राप्त करनेवाले को फक्त इस जन्म की ही सोच होती है । परलोक की सोच उनके दिमाग में होती ही नहीं है । स्वर्ग-नरक जैसे विचार उनको आते ही नहीं है । ऐसा ज्ञानी सुख तो डूबता है, साथ में संपर्क में आनेवाले को भी डुबता है । ऐसे ज्ञानी को पुण्य-पाप का गणित या पुण्य-पाप की विचारणा भी नहीं होती है ।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Close